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किसान आंदोलन और 1857 की क्रान्ति

                और तेज होगा किसान आंदोलन

 दिनांक 10 मई,  2021 को गाजीपुर बॉर्डर पर संयुक्त किसान मोर्चा ने 1857 के शहीदों को याद करते हुए शहीद मंगल पाण्डेय के तस्वीर पर माल्यार्पण कर श्रद्धांजलि दी। इस अवसर पर किसान आंदोलन के नेताओं ने 1857 की क्रांति और आज के किसान आंदोलन पर अपने उद्गार व्यक्त किए!

वक्ताओं ने बताया कि अंग्रेज  भारत के जमींदारों से मिलकर किसानों से अत्यधिक लगान वसूली कर रहे थे और उन्हें जमीन से बेदखल कर रहे थे। यही इस क्रांति की मूल जड़ में था।  खेती की बर्बादी और बढ़ती भूख बेरोजगारी में अंग्रेजों के शासन की बड़ी भूमिका थी। वे अपने माल को बेचने के लिए यहां के बुनकरों, लोहारों, बढ़ाई, चर्मकार- सब को बर्बाद कर रहे थे ताकि उनका माल यहां बिक सके।

देश के तमाम किसान, कारीगर, व्यापारी अंग्रेजों के राज के खिलाफ उठ खड़े हुए और कई देशभक्त रजवाड़ों ने भी उनका साथ दिया। 

आज के हालात से इसकी तुलना करते हुए वक्ताओं ने बताया कि जो तीन कानून सरकार लाई है और जो एमएसपी की गारंटी सरकार नहीं देना चाहती, इससे पूरी खेती बर्बाद हो जाएगी और बड़े कारपोरेट तथा विदेशी कंपनियों के हाथों में चली जाएगी। आज बड़ी कंपनियों के माल की बिक्री और छोटे व्यापारियों व कारीगरों के काम पर कॉरपोरेट का हमला भी  व्यापारियों की बर्बादी का बड़ा कारण बन रहा है। इसीलिए अट्ठारह सौ सत्तावन की क्रांति का हमारे आंदोलन के लिए एक विशेष महत्व है।

वक्ताओं ने इस युद्ध में भाग लेने वाले विभिन्न क्रांतिकारियों को याद किया गया। इनमें बड़ौत के शहामत, धौलाना के लाला झनकूमल, मथुरा के ठाकुर देवी सिंह, शाहजहांपुर के अहमदुल्लाह शाह, मेरठ के थानेदार धन सिंह गुर्जर, झांसी की रानी लक्ष्मीबाई व अन्य क्रांतिकारियों का नाम शामिल थे।

वक्ताओं ने बताया कि उस समय भी अंग्रेजी विदेशी कंपनी के खिलाफ विद्रोह था, आज भी यह लडाई बड़े कारपोरेट और उनसे जुड़े बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के खिलाफ है।

भाग ले रहे हैं सभी लोगों ने शहीद मंगल पांडे के प्रतिमा का माल्यार्पण किया।

 वक्ताओं में गाजीपुर बॉर्डर के नेता डॉ आशीष मित्तल, डीपी सिंह, धर्मपाल सिंह, बलजिंदर सिंह मान, बिंदु आमिनी, महादेव चतुर्वेदी, आदि शामिल थे। संचालन ओमपाल मलिक ने किया।

                 - जगतार सिंह बाजवा, प्रवक्ता/सदस्य

     संयुक्त किसान मोर्चा, गाज़ीपुर बार्डर

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