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Showing posts with the label हिंदी

इस इंद्रजाल को कैसे काटेंगे आप?..

                       राजसत्ता का इंद्रजाल सच यही है कि वे जो कुछ कर रहे हैं पूरे इत्मिनान और भरोसे के साथ कर रहे हैं! वे ऐसा ही सोचते हैं- राजा को राजा की तरह रहना चाहिए और प्रजा को प्रजा की तरह!...प्रजातंत्र का यह मतलब थोड़ी है कि प्रजा प्रजा न रहे, राजा होने की कोशिश करे। और भी कि परमात्मा ने जिसे जो करने के लिए भेजा है, वह वही करेगा- कर पाएगा! सब अम्बानी-अदानी थोड़ी हो जाएंगे?...देश संभालना कोई आसान काम है क्या?...जबकि लोग एक घर नहीं संभाल पाते तो जिसे देश सम्भालने का जिम्मा परमात्मा और परमात्मा के विश्वासियों द्वारा मिला है, वह जो कुछ कर रहा होगा- ठीक ही कर रहा होगा!... उसकी मर्ज़ी के बगैर जब एक पत्ता तक नहीं हिलता तो कोई बैंक या सार्वजनिक संस्थान अपने आप डूब सकता है?...भगवान की मर्ज़ी से ही व्यवस्था संभालने का जिम्मा मिलता है और उसकी इच्छा से ही राजकाज चलता है!... चीखने वालों को यह समझना चाहिए कि वे भगवान की मर्ज़ी पर सवाल उठा रहे हैं। उन्हें यह भी समझना चाहिए कि परमात्मा किसी भी देश-दुनिया से ऊपर की चीज, इन सबसे बड़ा है। जो य...

ताज का राज

                 केवल संख्या बल से कुछ                    नहीं होता!.. केवल संख्या-बल से कुछ नहीं होता हिंदुस्तानियों.. अंग्रेज़ तुमसे बहुत कम थे! अन्य देशों से आकर राज क़ायम करने वाले दूसरे शत्रु भी! कबूतर हमेशा नहीं उड़ जाया करते बहेलिए का जाल लेकर!.. अक्सर शिकारी के शिकार बनते हैं या उनके रहमोकरम पर दाना चुनते हैं! इन दिनों ही देखो, कितने कम हैं तुम पर  राज करने वाले उनसे भी बहुत कम हैं उन्हें राज का ताज पहनाने वाले! अगर तुम नहीं समझ सकते लोकतांत्रिक ताज़ का राज़ तो बहुमत का गणित-तंत्र तो समझने की कोशिश करो... अस्सी करोड़ से ज़्यादा बिना दया के राशन के नहीं रह पाएंगे, इसकी हकीकत इसकी परिस्थिति तो समझो!.. मत लड़ो उनके इशारों पर जिन्होंने सदियों सिर्फ़ धोखा दिया है राजमहल में रहने वालों ने सोचो, तुम्हारे साथ और क्या-क्या किया है...   सोचो कि आज नौकरी भी कितनी बची है तुम्हारे पास सर पर छत की जमीन भी नहीं और उन्होंने एक और पुष्पक विमान की कल्पना रची है!... जबकि चन्द्रमा और मंगल सिद्ध हो चुके ह...

बैंक से पैसा निकाल लो!..

महात्मा की  कहानियाँ :  दो:                      महात्मा नहीं परमात्मा!. .                     (कॉमा अपने आप लगा लीजिए) 【 पिछले अंश में  आपने महात्माजी का संक्षिप्त परिचय पाया था। आपने जाना था कि महात्माजी कोई साधारण आदमी नहीं हैं। उनके बारे में तरह-तरह की धारणाएँ हैं~ कि वे पहुँचे हुए आदमी हैं, धूर्त हैं, सीआईए के एजेंट हैं...आदि-आदि। लेकिन तब सब चौकन्ने हो गए जब महात्माजी ने कहा कि  "सावधान कर रहा हूँ, बैंक में रखा अपना सारा पैसा निकाल लो! बैंक में रखा पैसा अब सुरक्षित नहीं रह गया है!. ." अब आगे.. 】 ~~~          "क्यों?..क्यों महात्माजी? हम तो बैंक में पैसा सुरक्षित रखने के लिए ही डालते हैं और आप कह रहे हैं कि वहाँ पैसा रखना सुरक्षित नहीं रह गया है!"..                                                  ...

तो महात्माजी से परिचित नहीं हैं आप?

स्वर्ग की कहानियाँ :   एक:                 महात्माजी : परिचय           आप भी जान लीजिए! महात्माजी कभी झूठ नहीं बोलते!.... यह अलग बात है कि आम लोग उनकी भाषा नहीं समझते और अर्थ का अनर्थ करते हैं। महात्माजी के प्रवचनों को सुनने और समझने वाले प्रायः तीन प्रकार के लोग हैं। पहले नम्बर पर वे लोग हैं जो उनका मंतव्य समझ नहीं पाते और उनकी सत्यवादिता को मिथ्या-प्रलाप मान लेते हैं। ऐसे लोगों को आप उनका विरोधी या उनसे जलने वाला मान सकते हैं। दूसरी तरह के वे लोग हैं जो उनके मुखारविन्द से निकले वचनों का सही-सही अर्थ जानते हैं और इसे भविष्यवाणी मानकर सावधान हो जाते हैं। ऐसे लोग महात्माजी को कबीरदास के समकक्ष मानते हैं और कहते हैं- 'कबीरदासजी की उल्टी बानी, बरसै कम्बल भीजै पानी।' लेकिन सबसे समझदार तीसरी तरह के लोग हैं जो एक न एक दिन खुद भी महात्माजी जैसा बनने का सपना पालते हैं। उन्हें जन सामान्य भक्त कहता है लेकिन अपने करतबों से ऐसे लोगों ने दिखा दिया है कि वे भक्त नहीं बल्कि महात्माजी के सहभागी हैं। अक्सर ऐसे लोग फ़ायदे में ...

क्या आप साँप को दूध पिला रहे हैं?

                           साँप को दूध पिलाना               मुहावरा ही सही है! जी, हाँ! मुहावरे और कहावतें अज्ञानता की भी प्रतीक होती हैं। इसलिए उन्हें आप्त-वाक्य मानकर जो लोग बार-बार अपनी किसी बात को सही ठहराने की कोशिश करते हैं, उन्हें 'सांप को दूध पिलाना' मुहावरे पर ठीक से विचार करना चाहिए। क्योंकि क्या आप जानते हैं कि साँप दूध नहीं पीते और जबर्दस्ती उन्हें दूध पिलाने से उनकी मौत भी हो जाती है? सांप वे रेंगने वाले जीव हैं जो दूध, शाक-सब्जी नहीं खाते, न ही वे कोई शाकाहारी देवी-देवता हैं। साँप मांसाहारी होते हैं और जमीन पर चलने वाले दूसरे जीवों जैसे चूहा, मेढक, छिपकली व अन्य कीड़े-मकोड़ें खाकर जीवन-यापन करते हैं। उन्हीं की खोज में कभी-कभी वे मनुष्यों, नेवलों आदि के संपर्क में आने के कारण आकर अपनी जान भी गँवा बैठते हैं। हमारा देश धर्मप्राण देश माना जाता है। इस कारण जीवन के हर क्षेत्र में यहाँ धर्म की पैठ है। कभी-कभी तो धर्म के नाम पर लोग अधर्म भी कर जाते हैं। इन्हीं में से एक अधर्म हैं...

हिन्दी साहित्य के इतिहास लेखक-2

               स्वातंत्र्योत्तर हिन्दी साहित्य के                प्रसिद्ध इतिहास-ग्रन्थ                ★ हिन्दी साहित्य का आदिकाल (1952) -               - हजारी प्रसाद द्विवेदी ★ हिन्दी साहित्य की भूमिका       - हजारी प्रसाद द्विवेदी ★ हिन्दी साहित्य: उद्भव और विकास (1955)        - हजारी प्रसाद द्विवेदी   ★ आधुनिक हिन्दी कविता की मुख्य प्रवृत्तियाँ      (1951) - डॉ. नगेन्द्र ★ 'हिन्दी साहित्य का इतिहास' (सम्पादित)      और     'रीतिकाव्य की भूमिका'        - डॉ. नगेंद्र ★ हिन्दी साहित्य का नवीन इतिहास         - डॉ. बच्चन सिंह (1996) ★ हिन्दी साहित्य का दूसरा इतिहास        - डॉ....

हिन्दी काव्य के आधार: विद्यापति, गोरखनाथ, अमीर खुसरो, कबीर एवं जायसी

                              हिन्दी काव्य  कोरोना-काल के चलते विश्वविद्यालयों/महाविद्यालयों में भौतिक रूप से कम कक्षाएं चल पाने के चलते विद्यार्थियों के सामने पाठ्यक्रम पूरा करने की चुनौती तो है ही। साथ ही परीक्षा-उत्तीर्ण करने से ज़्यादा बड़ी चुनौती पूरे पाठ्यक्रम को आत्मसात करने की  है। क्योंकि पता नहीं कि परीक्षाएँ ओएमआर सीट पर वस्तुनिष्ठ हों या विस्तृत-उत्तरीय? विद्यार्थी इस चुनौती का सामना कैसे करें, इसके लिए यहाँ कुछ तरीके बताए जा रहे हैं। इसके पहले के लेख में विद्यार्थियों को समय-सारिणी बनाकर अध्ययन करने की आवश्यकता बताई गई थी। जो विद्यार्थी ऐसा कर रहे होंगे उन्हें इसके लाभ का अनुभव जरूर मिल रहा होगा। यहाँ  आदिकालीन हिन्दी के तीन कवियों- विद्यापति, गोरखनाथ एवं अमीर खुसरो तथा निर्गुण भक्ति काव्य के दो कवियों- कबीर एवं मलिक मोहम्मद जायसी के महत्त्वपूर्ण एवं स्मरणीय बिंदुओं को रेखांकित करने का प्रयास किया जा रहा है। वस्तुतः ये ही हिन्दी विशाल हिन्दी काव्यधारा के आधार कवि हैं जिनकी भावभूमियों पर ...

हिंदी स्नातक पाठ्यक्रम: सेमेस्टर सिस्टम की विडम्बनाएँ

स्नातक हिंदी प्रथम वर्ष प्रथम सत्र                    हिन्दी साहित्य:         नए पाठ्यक्रम की विडम्बनाएँ पूरे देश में  नई शिक्षा नीति  लागू करने की घोषणा के साथ विभिन्न विषयों के पाठ्यक्रम तय करने में साहित्य सम्बन्धी पाठ्यक्रम तय करना सम्भवतः सबसे दुरूह रहा होगा। कारण, साहित्य का अध्ययन सामाजिक चेतना की माँग पर आधारित होना चाहिए, न कि मात्र नौकरी मिलने/पाने की सम्भावनाओं पर आधारित। साहित्य कोई तकनीकी ज्ञान नहीं है, न उसे ऐसा समझा और विद्यार्थियों को परोसा जाना चाहिए। परन्तु बढ़ती बेरोजगारी से निपटने की आकांक्षा ने साहित्य को भी इसमें घसीट लिया है। इसलिए  साहित्य का पाठ्यक्रम भी सामाजिक चेतना का विकास  पर आधारित न होकर  बाज़ार की माँग के अनुरूप बनाया गया। लगता है पाठ्यक्रम मनीषियों ने जैसे यह मान लिया है कि सामाजिक चेतना विकसित करने का काम राजनीतिक पार्टियों का है।           उदाहरण स्वरूप उत्तरप्रदेश के हिंदी विषय का स्नातक प्रथम वर्ष का पाठ्यक्रम देखें तो लगता है क...

फणीश्वरनाथ रेणु: सुनो कहानी रेणु की

गतिविधि :  हिन्दी साहित्य                                     'रेणु-राग'                 फणीश्वरनाथ रेणु की जन्मशती के अवसर पर                                  राष्ट्रीय संगोष्ठी पटना, 19 दिसम्बर।  पटना विश्विद्यालय के हिंदी विभाग द्वारा फणीश्वरनाथ रेणु की जन्मशती के अवसर पर एक राष्ट्रीय संगोष्ठी  'रेणु-राग' पटना कॉलेज सेमिनार हॉल में  हुई। इस संगोष्ठी में  बिहार तथा बाहर के विभिन्न विश्विद्यालयों से जुड़े साहित्यकार, आलोचक व  प्रोफ़ेसर शामिल हुए। इसके साथ साथ बड़ी संख्या में पटना विश्विद्यालय के छात्रों के अलावा  साहित्य, संस्कृति से जुड़े बुद्धिजीवी , रंगकर्मी सामाजिक कार्यकर्ताओं के अतिरिक्त विभिन्न क्षेत्रों के प्रतिनिधि मौजूद थे।             संगोष्ठी का उद्घाटन रेणु के चित्र पर माल्यार्पण करने के साथ हुआ।...

बैंक बचाओ, देश बचाओ

              दिवालिया होने से पहले                     https://youtu.be/7t4BsE7d4wM                                                                  - अशोक प्रकाश इससे पहले कि 'भाइयों और बहनों!' से शुरू हो 'राष्ट्र के नाम' एक और संबोधन मैं खासकर राष्ट्रीकृत समस्त बैंकों, उनके कर्मचारियों और उनके ग्राहकों को कहीं छुपा देना चाहता हूँ ताकि दिवालिया घोषित होने से पहले 'राष्ट्रीय पूँजी' किसी बिटिया के विवाह और किसी बेटे के  परचून की दूकान खोलने में बाधा न बन सके! दिवालिया दुल्हन बनाकर जिसे विस्थापित किया जा रहा है लंदन, न्यूयॉर्क या स्विट्जरलैंड में  कालाधन कहकर जब तक कि उसे वापस लाने का वादा दोहराया जाए मैं खेतों में धान और गेहूँ की बालें देखना चाहता हूँ ताकि कब्ज़ा होने से पहले  खेत बता सकें दुबारा पैदा होने के कुछ गुर उन दानों क...

'नोटबन्दी' सा दुःस्वप्न फिर न देखना पड़े!

  ★ नोटबंदी कौ आल्हा ★                                          -- अशोक प्रकाश                               चित्र साभार: aajtak.in शीश नवाय के जनगनमन कौ धरिकै सब जनता कौ ध्यान, आल्हा गावहुँ उन बीरन कौं जोे लाइन महं तज दियौ प्रान।। आठ नवम्बर सन् सोलह कौ देस कौ पी एम गयौ पगलाय, भासन घातन ऐसो करि गयौ जनगनमन सब गयौ कुम्हलाय।। चारों तरफ तहलका मचि गयौ ऊ जापान महं रह्यौ मुस्काय, लाइन महं यां प्रान जाय रहे वा नीरो बाँसुरी बजाय।। इक-इक रुपिया मुश्किल ह्वै गयौ बड़ा नोट सब भयौ बेकार, खेती-बारी नष्ट ह्वै गई मज़दूरन घर हाहाकार।। काम-धाम सब छोड़ि-छाँड़ि के बैंकन चक्कर रह्यौ लगाय, उहां खेल सेठन कौ होइ रह्यौ भारी घात सह्यौ ना जाय।। अस्पताल का कहौं मुसीबत लोग मरैं बस भए बुखार, लगन सगाई शादी छोड़हुँ मरन काज ना मिलै उधार।। ऐसो राज न देखा कबहूँ ऐसो डाकौ सुन्यौ न भाय, अपनौ पैसो उनकौ होइ गयौ कम्पनियन रह्...

ऐय्याशियों का महल खड़ा करने वाले किस नेता को जिताएंगे आप?

                        किसको लड़ाना, हराना,                     जिताना चाहते हैं?    जहाँ देखो, जिधर देखो...जय,जय,जय! इस बाबा की जय, उस बाबा की जय! इस भगवान की जय, उस भगवान की जय! तो तुम भगवान को जिताने के लिए 'जयकारे' लगाते हो? जयकारे नहीं लगाए तुमने तो हार जाएंगे क्या भगवानजी?... और अब भगवान का जयकारा लगाते-लगाते चुनावों में जय-जय होने लगी? ये नेतालोग भगवान हैं क्या? जरा इन नेताओं के आचरण देखो भाइयों-बहनों, किन्हें भगवान बना रहे हो??...लोकतंत्र का बेड़ा ग़र्क़ करके अपनी ऐय्याशी के महल खड़े करने वाले नेताओं का जयकारा लगाते आप लोगों को जरा भी शर्म नहीं आती?... फिर क्या मतलब है इस जय का? यही तो न कि कोई जीते, कोई हारे?.. तो इसके लिए तो संघर्ष या युद्ध भी होगा ही न?.. किसको लड़ाना, हराना या जिताना चाह रहे हैं...युद्ध में झोंकना चाह रहे हैं? वो कौन है जिसके हारने से तुम डर रहे हो और जीतने की कामना कर रहे हो? वो कौन है जो युद्ध कर रहा है, लड़ाई के मैदान में है और तुम्हें उस...

कहीं आपमें कोई पालतू तो नहीं है?..

नौकर                          एक सामयिक बोध-कथा ● बाजार में एक चिड़ीमार तीतर बेच रहा था... उसके पास एक बडी जालीदार टोकरी में बहुत सारे तीतर थे!.. लेकिन एक छोटी जालीदार टोकरी में सिर्फ एक ही तीतर था!.. एक ग्राहक ने पूछा-  "एक तीतर कितने का है?.." "40 रुपये का!.." ग्राहक ने छोटी टोकरी के तीतर की कीमत पूछी  तो वह बोला,  "मैं इसे बेचना ही नहीं चाहता!.."  "लेकिन आप इसे ही लेने की जिद करोगे,  तो इसकी कीमत 500 रूपये होगी!.." ग्राहक ने आश्चर्य से पूछा,  "इसकी कीमत इतनी ज़्यादा क्यों है?.." चिड़ीमार ने जवाब दिया- "दरअसल यह मेरा अपना पालतू तीतर है और  यह दूसरे तीतरों को जाल में फंसाने का काम करता है!.. जब ये चीख पुकार कर दूसरे तीतरों को बुलाता है  और दूसरे तीतर बिना सोचे समझे ही एक जगह जमा हो जाते हैं... तो मैं आसानी से सभी का शिकार कर लेता हूँ!   बाद में,  मैं इस तीतर को उसकी मनपसंद की 'खुराक" दे देता हूँ जिससे ये खुश हो जाता है!..   बस, इसीलिए इसकी कीमत भी ज्यादा है !.." उस समझदा...

क्या राजा नंगा है?..

                            देखो, राजा नंगा है!.. एक देश में एक राजा हुआ करता था। उसको नये-नये प्रयोग करने का शौक था। सारे प्रयोग वह अपनी प्रजा और अपने कर्मचारियों पर करता था। एक दिन उसने एक खाई खुदवाई और उसमें आग के अंगारे दहकाये। इसके बाद उसने अपने कर्मचारियों को आदेश दिया कि सभी को इन अंगारो पर से गुजरना है इन अंगारों जो गुजर जाएगा, उसकी नौकरी बची रहेगी। अगर कोई अंगारो से गुजरते हुऐ मर जायेगा तो उसको पचास लाख का मुआवजा मिलेगा।  लेकिन जो अंगारो से गुजरने से मना कर देगा उसको नौकरी से निकाल दिया जाएगा।  कर्मचारियों ने मजबूर होकर राजा के आदेश को माना और दहकते हुये अंगारो से गुजरना शुरू किया। बड़ी मुश्किल से कुछ लोग पार कर पाये। मगर पर करते समय कुछ लोगों के पैर जल गये, कुछ फिसल गये तो उनके हाथ-मुँह सब जल गये। कुछ उसी आग में गिर गये जिनको घसीट कर निकाला गया।  किन्तु इनमें से तीन लोग उसी आग में भस्म हो गये जिनको आग से बचाने में लोग नाकाम रहे। इस प्रयोग के दो-चार दिन बाद जो लोग उस आग से झुलस गये थे उनकी जिन्द...

हे प्रभु, हम सब रामभरोसे!..

                         रे मन, तू रह रामभरोसे !                                   साभार: अमर उजाला, 18 मई, 2021 सचमुच, मुझे कष्ट  है!..जब देखो तब रामभरोसे! कहने वालों को 'रामभरोस' पर कोई शंका है क्या? हमारे इलाक़े में तो लोग इस शब्द पर इतना भरोसा करते हैं कि कई तो अपने बाल-बच्चों का नाम ही रामभरोस या रामभरोसे रख देते हैं। फिर किसी असफलता के बाद 'सब कुछ रामभरोसे..' कहने का क्या मतलब? दरअसल, पूरा देश अपरंच पूरा विश्व किंवा अखिल ब्रह्माण्ड रामभरोसे है तो किसी असफलता पर रामभरोसे कहना भरोसा पर भरोसा न जताने जैसा है! लोग गरीब हैं तो रामभरोसे कह दिया, लोग बीमार हैं तो रामभरोसे कह दिया! लोगों की नौकरी नहीं लगी, तनख्वाह नहीं मिली, लोगों की पेंशन बंद हुई, कम्पनी ने छह महीने बाद छंटनी कर दी, नोटबन्दी हुई, नौकरी से निकाल दिए जाने के बाद मजदूर ट्रेन-बस रोक दिए जाने के चलते  पैदल ही सैकड़ों किलोमीटर सड़कों पर चले; लोगों ने कहना शुरू दिया- 'भइय...