स्नातक हिंदी प्रथम वर्ष प्रथम सत्र हिन्दी साहित्य: नए पाठ्यक्रम की विडम्बनाएँ पूरे देश में नई शिक्षा नीति लागू करने की घोषणा के साथ विभिन्न विषयों के पाठ्यक्रम तय करने में साहित्य सम्बन्धी पाठ्यक्रम तय करना सम्भवतः सबसे दुरूह रहा होगा। कारण, साहित्य का अध्ययन सामाजिक चेतना की माँग पर आधारित होना चाहिए, न कि मात्र नौकरी मिलने/पाने की सम्भावनाओं पर आधारित। साहित्य कोई तकनीकी ज्ञान नहीं है, न उसे ऐसा समझा और विद्यार्थियों को परोसा जाना चाहिए। परन्तु बढ़ती बेरोजगारी से निपटने की आकांक्षा ने साहित्य को भी इसमें घसीट लिया है। इसलिए साहित्य का पाठ्यक्रम भी सामाजिक चेतना का विकास पर आधारित न होकर बाज़ार की माँग के अनुरूप बनाया गया। लगता है पाठ्यक्रम मनीषियों ने जैसे यह मान लिया है कि सामाजिक चेतना विकसित करने का काम राजनीतिक पार्टियों का है। उदाहरण स्वरूप उत्तरप्रदेश के हिंदी विषय का स्नातक प्रथम वर्ष का पाठ्यक्रम देखें तो लगता है क...
CONSCIOUSNESS!..NOT JUST DEGREE OR CERTIFICATE! शिक्षा का असली मतलब है -सीखना! सबसे सीखना!!.. शिक्षा भी सामाजिक-चेतना का एक हिस्सा है. बिना सामाजिक-चेतना के विकास के शैक्षिक-चेतना का विकास संभव नहीं!...इसलिए समाज में एक सही शैक्षिक-चेतना का विकास हो। सबको शिक्षा मिले, रोटी-रोज़गार मिले, इसके लिए जरूरी है कि ज्ञान और तर्क आधारित सामाजिक-चेतना का विकास हो. समाज के सभी वर्ग- छात्र-नौजवान, मजदूर-किसान इससे लाभान्वित हों, शैक्षिक-चेतना ब्लॉग इसका प्रयास करेगा.