प्रेमचंद का कालजयी साहित्य: https://youtu.be/16Ci1hB5o4k प्रेमचंद साहित्य आज इस इक्कीसवीं सदी के इस उथल-पुथल के दौर में, प्रेमचंद साहित्य की रचना की शुरुआत के लगभग सवा सौ साल बाद भी हमें लगता है कि प्रेमचंद को पढ़ना, उसका जन-जन तक पहुँचना-पहुँचाना अब और ज़्यादा जरूरी हो गया है। आज़ादी की माँग के वे कारण जिन्हें हम औपनिवेशिक दास्ताँ के रूप में जानते आए हैं, आज कहीं और ज़्यादा झकझोरने वाले हैं। आज उस दौर के ठीक उलट विदेशी कम्पनियों के लिए पलक-पाँवड़े बिछाए जा रहे हैं। विदेशों के कई-कई चक्कर काटकर कम्पनियों को लुभाया जा रहा है कि आज भारत पहले से कहीं ज़्यादा निवेश के माक़ूल है, आइए और मुनाफ़ा कमाइए! 'अब दुनिया बदल गई है' - कहकर कितना भी हम इस सच्चाई को ढांपने-तोपने की कोशिश करें किन्तु प्रेमचंद ने 'महाजनी सभ्यता' कहकर जिस गुलामी के खिलाफ जनता में चेतना विकसित की थी, वह आज भी वैसे ही बल्कि उससे भी ज़्यादा हमारी मुश्किलों के लिए जिम...
CONSCIOUSNESS!..NOT JUST DEGREE OR CERTIFICATE! शिक्षा का असली मतलब है -सीखना! सबसे सीखना!!.. शिक्षा भी सामाजिक-चेतना का एक हिस्सा है. बिना सामाजिक-चेतना के विकास के शैक्षिक-चेतना का विकास संभव नहीं!...इसलिए समाज में एक सही शैक्षिक-चेतना का विकास हो। सबको शिक्षा मिले, रोटी-रोज़गार मिले, इसके लिए जरूरी है कि ज्ञान और तर्क आधारित सामाजिक-चेतना का विकास हो. समाज के सभी वर्ग- छात्र-नौजवान, मजदूर-किसान इससे लाभान्वित हों, शैक्षिक-चेतना ब्लॉग इसका प्रयास करेगा.