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Showing posts with the label hindi literature

तोताराम बनने का सुख

                      शांति...शांति कहिए                         तोताराम बनिए!                                  -- अशोक प्रकाश यदि अन्यायी- अत्याचारी किसी कमजोर पर अत्याचार करे आप शांत रहें क्योंकि वह आप पर अत्याचार नहीं कर रहा और जब वह आप पर अत्याचार करे तो दूसरे को शांत रहने का उपदेश दें क्योंकि वह उस पर अत्याचार नहीं कर रहा... 'अन्याय और अत्याचार से  कम दोषी  नहीं होते अन्याय -अत्याचार सहने वाले...' झूठ है, गलत है... सही और मान्य है बलात्कारी से  उम्मीद और आशा अन्याय और अत्याचार की  आध्यात्मिक परिभाषा!.. सब  प्रभू की माया है कहीं धूप कहीं छाया है... ऊपर वाले की मर्ज़ी से सब होता है... उसी की मर्ज़ी से ही तो आखिर तोता बोलता है! तोताराम बनिए शांति-शांति कहिए!                             ☺️☺️☺️☺️☺️☺...

हिंदी स्नातक पाठ्यक्रम: सेमेस्टर सिस्टम की विडम्बनाएँ

स्नातक हिंदी प्रथम वर्ष प्रथम सत्र                    हिन्दी साहित्य:         नए पाठ्यक्रम की विडम्बनाएँ पूरे देश में  नई शिक्षा नीति  लागू करने की घोषणा के साथ विभिन्न विषयों के पाठ्यक्रम तय करने में साहित्य सम्बन्धी पाठ्यक्रम तय करना सम्भवतः सबसे दुरूह रहा होगा। कारण, साहित्य का अध्ययन सामाजिक चेतना की माँग पर आधारित होना चाहिए, न कि मात्र नौकरी मिलने/पाने की सम्भावनाओं पर आधारित। साहित्य कोई तकनीकी ज्ञान नहीं है, न उसे ऐसा समझा और विद्यार्थियों को परोसा जाना चाहिए। परन्तु बढ़ती बेरोजगारी से निपटने की आकांक्षा ने साहित्य को भी इसमें घसीट लिया है। इसलिए  साहित्य का पाठ्यक्रम भी सामाजिक चेतना का विकास  पर आधारित न होकर  बाज़ार की माँग के अनुरूप बनाया गया। लगता है पाठ्यक्रम मनीषियों ने जैसे यह मान लिया है कि सामाजिक चेतना विकसित करने का काम राजनीतिक पार्टियों का है।           उदाहरण स्वरूप उत्तरप्रदेश के हिंदी विषय का स्नातक प्रथम वर्ष का पाठ्यक्रम देखें तो लगता है क...

जानिए योगियों के नाथ-सम्प्रदाय को

नाथ सम्प्रदाय  और  गुरु  गोरखनाथ              नाथ-सम्प्रदाय: एक परिचय   अगर सिद्धों, नाथों, योगियों की वाणी और उनके क्रिया-कर्मों पर आप ध्यान दें तो वे पूरी तरह भौतिकवाद को महत्त्व देने वाले, पारलौकिक जगत को नकारने वाले प्रतीत होते हैं। वे ऐसे इहलौकिक कवि/विचारक हैं कि मूर्तिपूजा और पाखंड उनके सामने नतमस्तक दिखाई देता है। ये सारे कवि ललकारते हुए अपनी बात को सही 'सिद्ध' करते हैं, शरीर के भीतर ही आत्मा-,परमात्मा का अस्तित्व मानते हैं। इस तरह वे आज के तथाकथित 'हिन्दू' या 'सनातन' विचार के ख़िलाफ़ खड़े होते दिखाई देते हैं जिसे आज पुरजोर लगाकर प्रतिष्ठित करने का प्रयास किया जा रहा है। दरअसल वे सही मायनों गौतम बुद्ध के अनुयायी हैं जिन्होंने 'सनातन' नहीं, 'परिवर्तन' को परम सत्य माना। दुर्भाग्य से आज गोरखनाथ के तथाकथित शिष्यगण उनके विचारों के उलट काम करने वाले, धार्मिक पाखंडों को बढ़ावा देने वाले हैं।            जानिए ऐसे नाथपंथी महान साहित्यिक विभूतियों का अवदान और विचार कीजिए उनके योग-जोग पर जो विरले ही कहीं दिखता...

ऐय्याशियों का महल खड़ा करने वाले किस नेता को जिताएंगे आप?

                        किसको लड़ाना, हराना,                     जिताना चाहते हैं?    जहाँ देखो, जिधर देखो...जय,जय,जय! इस बाबा की जय, उस बाबा की जय! इस भगवान की जय, उस भगवान की जय! तो तुम भगवान को जिताने के लिए 'जयकारे' लगाते हो? जयकारे नहीं लगाए तुमने तो हार जाएंगे क्या भगवानजी?... और अब भगवान का जयकारा लगाते-लगाते चुनावों में जय-जय होने लगी? ये नेतालोग भगवान हैं क्या? जरा इन नेताओं के आचरण देखो भाइयों-बहनों, किन्हें भगवान बना रहे हो??...लोकतंत्र का बेड़ा ग़र्क़ करके अपनी ऐय्याशी के महल खड़े करने वाले नेताओं का जयकारा लगाते आप लोगों को जरा भी शर्म नहीं आती?... फिर क्या मतलब है इस जय का? यही तो न कि कोई जीते, कोई हारे?.. तो इसके लिए तो संघर्ष या युद्ध भी होगा ही न?.. किसको लड़ाना, हराना या जिताना चाह रहे हैं...युद्ध में झोंकना चाह रहे हैं? वो कौन है जिसके हारने से तुम डर रहे हो और जीतने की कामना कर रहे हो? वो कौन है जो युद्ध कर रहा है, लड़ाई के मैदान में है और तुम्हें उस...

प्रेमचंद अभी भी प्रासंगिक क्यों लगते हैं?..

          प्रेमचंद का कालजयी साहित्य:                        https://youtu.be/16Ci1hB5o4k   प्रेमचंद साहित्य        आज इस इक्कीसवीं सदी के इस उथल-पुथल के दौर में,  प्रेमचंद साहित्य    की रचना की शुरुआत के लगभग सवा सौ साल बाद भी हमें लगता है कि प्रेमचंद को पढ़ना, उसका जन-जन तक पहुँचना-पहुँचाना अब और ज़्यादा जरूरी हो गया है। आज़ादी की माँग के वे कारण जिन्हें हम औपनिवेशिक दास्ताँ के रूप में जानते आए हैं, आज कहीं और ज़्यादा झकझोरने वाले हैं। आज उस दौर के ठीक उलट विदेशी कम्पनियों के लिए पलक-पाँवड़े बिछाए जा रहे हैं। विदेशों के कई-कई चक्कर काटकर कम्पनियों को लुभाया जा रहा है कि आज भारत पहले से कहीं ज़्यादा निवेश के माक़ूल है, आइए और मुनाफ़ा कमाइए! 'अब दुनिया बदल गई है' - कहकर कितना भी हम इस सच्चाई को ढांपने-तोपने की कोशिश करें किन्तु प्रेमचंद ने 'महाजनी सभ्यता' कहकर जिस गुलामी के खिलाफ जनता में चेतना विकसित की थी, वह आज भी वैसे ही बल्कि उससे भी ज़्यादा हमारी मुश्किलों के लिए जिम...