खून के प्यासे तमाशबाज और तमाशबीन जन संचार माध्यम पिछले डेढ़ साल से हमारे देश के टीवी चैनलों पर, खासकर हिन्दी समाचार चैनलों पर युद्ध की खबरें छाई हुई हैं। यूक्रेन पर रूसी हमले से लेकर, फिलीस्तीन पर इजरायली हमले और अब ईरान पर अमेरिकी-इजराइली हमले तक टीवी के परदे पर युद्ध को एक तमाशा की तरह परोसा जा रहा है। पर टीवी पर युद्ध की खबरों की यह भरमार न तो युद्धों के बारे में किसी गंभीर जानकारी-समझदारी की ओर ले जाती है और न ही युद्धों के प्रति नफरत की ओर। इसके ठीक विपरीत वे युद्ध को एक उत्तेजनापूर्ण मनोरंजन की तरह पेश करती हैं तथा दर्शकों में युद्ध की विभीषिका के प्रति एक तरह की संवेदनहीनता को जन्म देती हैं। टीवी के परदे पर दिखने वाली तबाही एक कुत्सित आनंद का स्रोत बन जाती है। टीवी चैनलों के मालिकों और कर्ता-धर्ता का इस मामले में उद्देश्य साफ होता है। वे युद्ध को एक उत्तेजक मनोरंजन के तौर पर पेश कर दर्शकों को अपनी तरफ खींचना चाहते हैं जिससे उनका व्यवसाय बढ़े। लगे...
CONSCIOUSNESS!..NOT JUST DEGREE OR CERTIFICATE! शिक्षा का असली मतलब है -सीखना! सबसे सीखना!!.. शिक्षा भी सामाजिक-चेतना का एक हिस्सा है. बिना सामाजिक-चेतना के विकास के शैक्षिक-चेतना का विकास संभव नहीं!...इसलिए समाज में एक सही शैक्षिक-चेतना का विकास हो। सबको शिक्षा मिले, रोटी-रोज़गार मिले, इसके लिए जरूरी है कि ज्ञान और तर्क आधारित सामाजिक-चेतना का विकास हो. समाज के सभी वर्ग- छात्र-नौजवान, मजदूर-किसान इससे लाभान्वित हों, शैक्षिक-चेतना ब्लॉग इसका प्रयास करेगा.