श्रीकृष्ण-कथा: हर लेती मन की व्यथा! राधा-कृष्ण प्रेम में है छुपा गूढ़ सामाजिक संदेश भांडीरवन के समीप वंशीवट का वह शांत, सुरम्य प्रदेश संध्या की स्वर्णिम आभा में नहाया हुआ था। यमुना की मंद लहरें किनारे से टकराकर जैसे कोई अनसुना गीत गा रही थीं। कदम्ब वृक्षों की छाया में शीतल समीर पुष्पों की सुगंध लेकर बह रही थी। पक्षियों का कलरव धीरे धीरे मौन में विलीन हो रहा था, मानो सम्पूर्ण प्रकृति किसी दिव्य क्षण की प्रतीक्षा कर रही हो। उस वंशीवट के नीचे श्यामसुंदर श्रीकृष्ण खड़े थे। उनके अधरों पर वंशी सजी थी और उससे निकलती मधुर तान केवल संगीत नहीं थी, वह प्रेम का निमंत्रण थी, आत्मा का आह्वान थी। प्रत्येक स्वर जैसे एक ही नाम पुकार रहा था, "राधे... राधे..." गौएँ चरना छोड़कर उसी ओर निहारने लगीं। मयूर अपने पंख फैलाकर स्थिर हो गए। वृक्षों की पत्तियाँ तक हिलना भूल गईं। ऐसा प्रतीत होता था कि स्वयं समय भी उस मधुर वंशी के सम्मोहन में ठहर गया हो। किन्तु आज वह प्रतीक्षा कुछ लंबी हो गई। एक घड़ी बीत...
CONSCIOUSNESS!..NOT JUST DEGREE OR CERTIFICATE! शिक्षा का असली मतलब है -सीखना! सबसे सीखना!!.. शिक्षा भी सामाजिक-चेतना का एक हिस्सा है. बिना सामाजिक-चेतना के विकास के शैक्षिक-चेतना का विकास संभव नहीं!...इसलिए समाज में एक सही शैक्षिक-चेतना का विकास हो। सबको शिक्षा मिले, रोटी-रोज़गार मिले, इसके लिए जरूरी है कि ज्ञान और तर्क आधारित सामाजिक-चेतना का विकास हो. समाज के सभी वर्ग- छात्र-नौजवान, मजदूर-किसान इससे लाभान्वित हों, शैक्षिक-चेतना ब्लॉग इसका प्रयास करेगा.