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कृष्ण-कथा: हर लेती मन की व्यथा

                          भांडीर वन में                 राधा-कृष्ण के प्रथम मिलन की कथा           भांडीरवन की दोपहर थी! सूर्य आकाश के मध्य मानो ठहर-सा गया था।...  यमुना की ओर से आती मंद पवन वृक्षों के पत्तों को धीरे-धीरे हिला रही थी। गायें हरी घास चर रही थीं और ग्वालबाल भोजन करके इधर-उधर विश्राम कर रहे थे। कदम्ब के विशाल वृक्ष के नीचे बालकृष्ण लेटे थे। सिर के नीचे अपनी भुजा रखे, अधरों पर हल्की मुस्कान लिए उन्होंने आंखें मूँद लीं। उनके मन में बीते हुए कल की एक मधुर लहर उठने लगी।.. कल प्रातः उन्होंने पहली बार उस गौरवर्णी किशोरी को देखा था। यमुना तट पर खड़ी वह अपने सखियों के साथ पुष्प चुन रही थी। क्षणभर के लिए दोनों की दृष्टियाँ मिली थीं। न कोई परिचय हुआ, न कोई संवाद, किन्तु वह एक क्षण जैसे अनन्त बन गया। आज उसी स्मृति ने कृष्ण के हृदय में अपना घर बना लिया था। उन्होंने मन ही मन सोचा, "वह कौन थी? उसकी आँखों में ऐसा अपनापन क्यों था, मानो युगों से जानता हू...
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ब्रह्मराक्षस योनि से मुक्ति कैसे?.सुनिए!.(2)

              ब्रह्मराक्षस की मुक्ति-कथा                   ब्रह्मराक्षस कविता   भारतीय पौराणिक और मिथकीय कथाओं के इतने जीवन्त और सारगर्भित संकेतार्थ रहे हैं कि सदियां बीत जाने के बावज़ूद लोकमानस में उनकी जड़ें जमी हुई हैं। व्यापक जनता उनसे प्रेरणा लेती है, उनमें अपने जीवन के संदेश पाती है।         ऐसे प्रसिद्ध और आकर्षक मिथकों में एक मिथक 'ब्रह्मराक्षस' है। हिंदी साहित्य के एक प्रमुख हस्ताक्षर गजानन माधव 'मुक्तिबोध' ने न केवल 'ब्रह्मराक्षस' शीर्षक एक प्रसिद्ध कविता लिखी है बल्कि अपनी अन्य कविताओं में भी ऐसे मिथकों का उपयोग किया है।        आइए, आपको इस जीवन्त मिथकीय चरित्र से आपका परिचय कराते हैं और आपसे पूछते हैं कि आपने अपने गाँवों/कस्बों/शहरों में ऐसे नायब चरित्र को देखा-सुना है या नहीं?..टिप्पणी/कमेंट में अपनी राय/जिज्ञासा लिखकर ब्रह्मराक्षस की अवधारणा और भी जीवन्त और रोचक बनाएँ!           कहते हैं प्राचीन काल में मध्यप्रदेश के एक गाँव मे...

ब्रह्मराक्षस कौन है?..(1)

गजानन माधव 'मुक्तिबोध'~  कविता:                 'ब्रह्मराक्षस' गजानन माधव 'मुक्तिबोध'   हिंदी के ऐसे कवि हैं जिनकी कविताओं का मर्म भेदने के लिए कविता के शब्दों से अधिक मुक्तिबोध के मानस में उतरना पड़ता है। उनकी कविताओं के शब्द एक पर्दे की तरह हैं जिनको खोले बिना आप उनके पीछे का संसार नहीं देख सकते, उसके सौंदर्य को नहीं परख सकते। केवल शब्दों से उनके काव्य-सौंदर्य की थाह लगा लेना उसी तरह मुश्किल है जैसे किसी कमरे के पर्दे के बाहर से कमरे के भीतर की स्थितियों को जानने की कोशिश करना। उनके शब्द अनुमान का साधन मात्र हैं, प्रत्यक्ष का अनुभव कराने के साधन नहीं- उद्भ्रांत शब्दों के नए आवर्त में हर शब्द निज प्रति शब्द को भी काटता, वह रूप अपने बिंब से भी जूझ विकृताकार-कृति है बन रहा...                             - 'ब्रह्मराक्षस' मुक्तिबोध की कविताओं में ऐसे ही शब्दों के अनेक आवर्त-चक्र मिलते हैं जो उनकी कविताओं के नए पाठकों  को चकरा देते हैं। कविताओं के शब्द अपने ही नए ...

इंद्र की चुनौती और ब्रजलोक का उत्तर

                          मृत्युलोक  नहीं,           स्वर्गलोक है ब्रजलोक! हालाँकि ब्रज के लोग  कभी स्वयं को मृत्युलोक के वासी न मानते थे और न कहलाना पसंद ही करते थे लेकिन  इंद्रसभा ने इसे 'मृत्युलोक' घोषित कर रखा था और देवराज इंद्र ने इन्हें मृत्युलोक के वासी ही  बनाए रखने का पूरा इंतज़ाम कर रखा था!  इसीलिए बेमौसम अतिवृष्टि घनघोर बादल कड़कती बिजली और फिर एकाएक तेज बरसात इन्द्र का रौद्र रूप!.. यही नहीं इंद्रसभा के देवदूत जब ब्रज में आते तो यहाँ की खुशहाल जिंदगी को नारकीय बना जाते  वे मृत्युलोक की जगह इसे 'नर्कलोक' कहते और मजाक उड़ाते कहते, 'देखो ये हैं नर्कलोक के लोग!' सीधे-सच्चे ब्रजवासी मान भी लेते कि उनकी जिंदगी नर्क बनने के शायद वे स्वयं ही जिम्मेदार हैं! वे इंद्र के देवदूतों के हर आदेश का पालन करते और इंद्र की प्रार्थना करते हुए कहते कि 'हे देवराज, अबकी वर्षाऋतु में हमारे स्वजनों और गौवंश को बचाए रखना, यमुना देवी के प्रकोप का भाजन हमें न होने देना!..' लेकिन ऐसा शायद ...

क्या बेरोजगारी वैश्विक कारणों से हैं?..

                    कॉरपोरेट मुनाफों के दौर में        क्या बेरोजगारी स्वाभाविक है? दिल्ली के गाँधी शांति प्रतिष्ठान के सभागार में सम्पन्न हुए रोजगार अधिकार अभियान के एक राष्ट्रीय सम्मेलन में मुख्यतः युवाओं को पहलकदमी कर बेरोजगारी के सवाल पर गम्भीरता से आंदोलन चलाने जरूरत रेखांकित की गई। क्योंकि इतनी विषम बेरोजगारी की परिस्थितियों में भी अगर वे एकजुट नहीं होते तो भविष्य अंधकारमय ही रहना है। यद्यपि राजनीतिक दलों के अपने युवा-बेरोजगार संगठन भी होते हैं लेकिन वे राजनीतिक मजबूरियों के चलते इस मुद्दे पर स्वतंत्र ढंग से काम नहीं कर पाते। सम्मेलन में रेखांकित किया गया कि  लोककल्याणकारी राज्य की जिम्मेदारी है कि वह निम्न मसलों को जन पक्षधर तरीके से हल करे: • सुपर रिच पर टैक्स हल करेगा जन सवालों को  • सम्मानजनक जीवन सरकार की जिम्मेदारी  • देश में संसाधनों की नहीं है कमी • रोजगार अधिकार का कानून बनाया जाए  • पूंजी का संकेंद्रण खत्म कर रहा है लोकतंत्र         इस सम्मेलन के द्वारा 19 स...

भारत के मिनी-स्विट्जरलैंड के खज्जिनाग को जानते हैं आप?

   खज्जिनाग का खजियार, हिमाचल  हमारे देश में ही नहीं, पूरी दुनिया में मिथकों और दंतकथाओं का वहाँ की संस्कृति के निर्माण में विशेष महत्व है। इन मिथकों और दंतकथाओं को वहाँ की संस्कृति से निकाल दीजिए तो संस्कृति काठ या पत्थर हो जाएगी, उसका आकर्षण छू-मंतर हो जाएगा। हमारे देश में तो इन कथाओं-कहानियों में ही सभ्यता-संस्कृति के प्राण बसते हैं।         हिमाचल प्रदेश का चम्बा जिला ऐसी अनेक मिथक कहानियों का खज़ाना है। अलौकिक प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर डलहौज़ी और खज्जियार भी ऐसी अनेक कहानियों को अपने आगोश में समेटे है!! विशेषकर खजियार या खज्जियार का तो जैसे निर्माण ही इन कथाओं से हुआ है।          भारत का 'मिनी स्विट्जरलैंड'  कहे जाने वाले खजियार के बारे में कई अद्भुत कहानियां हैं जिन्हें यहाँ के निवासी 'इतिहास' मानकर दिल में संजोए हुए हैं।          कहते हैं सदियों पहले चम्बा जिला में एक राणे हुए। एक दिन इनकी दृष्टि लिली नामक गाँव के सामने पहाड़ पर पड़ी। वहाँ की ...

प्रयागराज में हैं तो जरूर देखें!

            प्रयागराज में भी है बना                दक्षिण भारतीय मन्दिर        मध्यकाल का यह शिवाला चमत्कारी है! जनपद #प्रयागराज की तहसील फूलपुर के अंतर्गत ग्राम पूरे सूरदास #झूँसी स्थित यह प्रसिद्ध 'गंगोली शिवालय' एक अद्भुत #शिवालय है! 'गंगोली शिवाला' नाम से प्रसिद्ध यह मंदिर #संगम के ईशान कोण पर स्थित है! शिव पुराण के मंत्रों में अभिहित चित्रांकन के अनुसार मंदिर में विभिन्न देवी-देवताओं और उनके वाहनों के चित्र उकेरे गए हैं!  यह शिवालय उत्तराभिमुख प्रस्तर एवं लखौरी ईंटों से निर्मित चतुर्दिक ऊँचे परकोटे से आवृत है! इसका निर्माण बलुए पत्थर आदि से किया गया है। ऊँचे चबूतरे पर निर्मित शिवालय के चतुर्दिक पददक्षिणापथ के रूप में दो स्तम्भों एवं दो अर्द्धस्तम्भों पर आधारित चौड़ा बरामदा है। बरामदे की बाह्य दीवारों के दोनों कोनों पर रथिकाओं में विविध देवी -देवताओं की मूर्तियाँ रूपांकित हैं।  शिवालय के गर्भगृह के ऊपर उरुश्रृंगों से अलंकृत नागर शैली पर आधारित पंचरथ शिखर शोभायमान है। इसका शीर्ष आमलक, क...