मृत्युलोक नहीं,
स्वर्गलोक है ब्रजलोक!
हालाँकि ब्रज के लोग
कभी स्वयं को मृत्युलोक के वासी
न मानते थे और
न कहलाना पसंद ही करते थे
लेकिन इंद्रसभा ने
इसे 'मृत्युलोक' घोषित कर रखा था
और
देवराज इंद्र ने इन्हें मृत्युलोक के वासी ही
बनाए रखने का पूरा इंतज़ाम कर रखा था!
इसीलिए बेमौसम अतिवृष्टि
घनघोर बादल
कड़कती बिजली और
फिर एकाएक तेज बरसात
इन्द्र का रौद्र रूप!..
यही नहीं
इंद्रसभा के देवदूत जब ब्रज में आते तो
यहाँ की खुशहाल जिंदगी को
नारकीय बना जाते
वे मृत्युलोक की जगह इसे 'नर्कलोक' कहते
और मजाक उड़ाते
कहते, 'देखो ये हैं नर्कलोक के लोग!'
सीधे-सच्चे ब्रजवासी मान भी लेते कि
उनकी जिंदगी नर्क बनने के
शायद वे स्वयं ही जिम्मेदार हैं!
वे इंद्र के देवदूतों के हर आदेश का पालन करते
और इंद्र की प्रार्थना करते हुए कहते कि
'हे देवराज, अबकी वर्षाऋतु में
हमारे स्वजनों और गौवंश को बचाए रखना,
यमुना देवी के प्रकोप का भाजन हमें न होने देना!..'
लेकिन ऐसा शायद ही किसी वर्ष हुआ हो
जब वर्षाऋतु के बाद उनके सभी स्वजन और
गौवंश सुरक्षित बच निकले हों!
अपने से भी अधिक चिंता ब्रजवासियों को
अपने गौवंश की होती, क्योंकि
गायें और गौवंश
उनके ब्रज के जीवन का आधार था!
तब मथुरा का राजा कंस
देवराज इंद्र का भी प्रिय था और
ब्रजवासियों से मनमाना कर दुग्ध-दधि आदि
वसूलता और इंद्र को तरह-तरह के
हव्य और द्रव्य भेजता रहता!
उसने यह प्रचार कर रखा था कि वह
स्वयं ही भगवान है और प्रजा को उसे
भगवान की तरह ही पूजना चाहिए!
ब्रजवासी कंस और इंद्र के
इस दोहरे शोषण-उत्पीड़न से अत्यंत दुखी
और त्रस्त रहते,
वे हमेशा इनके राज के अंत की
कामना करते!...
ऐसे में एक दिन
ब्रजवासियों ने सुना कि नंदगाँव के
नन्द के यहॉं एक अद्भुत बालक का
अवतरण हुआ है,
समाचार कुछ इस तरह
प्रचारित-प्रसारित हुआ कि
जो भी इस बालक को देखता है,
अभिभूत हो जाता है!
देवपुत्रों से भी अधिक आकर्षक और विस्मयकारी
इस बालक को देखते ही सारे कष्ट
छू-मंतर हो जाते हैं!..
~ क्रमशः
@कृष्णानंद


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