कॉरपोरेट मुनाफों के दौर में
क्या बेरोजगारी स्वाभाविक है?
दिल्ली के गाँधी शांति प्रतिष्ठान के सभागार में सम्पन्न हुए रोजगार अधिकार अभियान के एक राष्ट्रीय सम्मेलन में मुख्यतः युवाओं को पहलकदमी कर बेरोजगारी के सवाल पर गम्भीरता से आंदोलन चलाने जरूरत रेखांकित की गई। क्योंकि इतनी विषम बेरोजगारी की परिस्थितियों में भी अगर वे एकजुट नहीं होते तो भविष्य अंधकारमय ही रहना है। यद्यपि राजनीतिक दलों के अपने युवा-बेरोजगार संगठन भी होते हैं लेकिन वे राजनीतिक मजबूरियों के चलते इस मुद्दे पर स्वतंत्र ढंग से काम नहीं कर पाते।
सम्मेलन में रेखांकित किया गया कि लोककल्याणकारी राज्य की जिम्मेदारी है कि वह निम्न मसलों को जन पक्षधर तरीके से हल करे:
• सुपर रिच पर टैक्स हल करेगा जन सवालों को
• सम्मानजनक जीवन सरकार की जिम्मेदारी
• देश में संसाधनों की नहीं है कमी
• रोजगार अधिकार का कानून बनाया जाए
• पूंजी का संकेंद्रण खत्म कर रहा है लोकतंत्र
इस सम्मेलन के द्वारा 19 सदस्यीय संचालन समिति का गठन और सलाहकार समिति पर हुई चर्चा। तय किया गया था कि जोन, जिला व कैम्पस में होगा रोजगार पर संवाद।
सुपर रिच की संपत्ति पर समुचित टैक्स लगाने, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार की गारंटी करने, देशभर में सरकारी विभागों में खाली पदों को तत्काल भरने, हर व्यक्ति के सम्मानजनक जीवन की गारंटी करने के सवाल पर इस तरह के सम्मेलन जगह-जगह होते रहे हैं। पर असल सवाल का उत्तर मिलना अभी भी बाकी है कि क्या किसी सरकार के काम पर जूं तक रेंगी। सम्मेलन को देश भर से आए बेरोजगारों एवं गणमान्य व्यक्तियों ने संबोधित किया और अपने सुझाव रखे।
यह सम्मेलन सर्वसम्मति से इस निर्णय पर पहुंचा कि रोजगार का सवाल राजनीतिक अर्थनीति से जुड़ा हुआ है। छात्रों - युवाओं के साथ समाज के बड़े हिस्से को बेरोजगारी का सवाल प्रभावित करता है। सम्मेलन यह मानता है कि देश में संसाधनों की कोई कमी नहीं है। संसाधन जुटाए जा सकते हैं यदि बड़े पूंजी घरानों की सम्पत्ति पर समुचित टैक्स लगाया जाए और उचित अर्थनीति बने। इन संसाधनों से छात्रों व युवाओं को शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार की गारंटी होगी। साथ ही पुरानी पेंशन बहाली, आंगनबाड़ी, आशा कार्यकर्त्रियों समेत सभी स्कीम वर्कर्स और ठेका/संविदा पर काम करने वाले मजदूरों को पक्की नौकरी व सम्मानजनक वेतनमान, किसानों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य की कानूनी गारंटी व खेती सहित छोटे मझोले उद्योगों के सहकारीकरण के लिए निवेश और नागरिकों की सामाजिक सुरक्षा जैसे सवालों को हल किया जा सकता है।
सम्मेलन सह बैठक ने लिए प्रस्ताव में अटल बिहारी वाजपेई सरकार के जमाने में बनाए गए राजकोषीय उत्तरदायित्व और बजट प्रबंधन अधिनियम 2003 को बड़ी पूंजी के पक्ष में बनाया गया कानून माना। बावजूद इसके यदि पूंजीपतियों पर उचित टैक्स लगाया जाए तो राजकोषीय घाटे के इस कानून की जरूरत ही नहीं रह जाएगी।
सम्मेलन में विविध मुद्दों को जन-जन तक ले जाने और इन पर 'संवाद अभियान' चलाने का निर्णय लिया गया। राज्य, जोन, जिला व कैम्पसों में सम्मेलन किये जायेंगे। सम्मेलन में रोजगार अधिकार अभियान के संचालन के लिए 19 सदस्यीय संचालन समिति का गठन किया और भविष्य में इसके विस्तार का निर्णय हुआ। साथ ही इसकी मदद के लिए किसान, मजदूर, महिला, कर्मचारी, पर्यावरण आदि आंदोलन के प्रतिनिधियों, जनपक्षीय अर्थशास्त्रियों, अधिवक्ताओं और नागरिकों को लेकर सलाहकार समिति के गठन पर विचार किया गया। अभियान के चार मुद्दों से जो भी सहमति व्यक्त करेगा वह इस अभियान का हिस्सा बनेगा।
सम्मेलन को संबोधित करते हुए एक वक्ता ने कहा कि देश के हर नागरिक के सम्मानजनक जीवन की गारंटी करना सरकार की जिम्मेदारी है। यदि देश के चंद कॉर्पोरेट घरानों की संपत्ति पर महज 2 प्रतिशत संपत्ति कर और 30 प्रतिशत विरासत कर लगा दिया जाए तो देश के हर नागरिक को पांच संवैधानिक अधिकारों की गारंटी हो सकती है। जिसमें रोजगार का अधिकार, भोजन का अधिकार, बेहतर और मुफ्त शिक्षा और स्वास्थ्य का अधिकार, वृद्ध व्यक्तियों को पेंशन का अधिकार मिल सकता है। इस टैक्स से लोगों की सामाजिक सुरक्षा की गारंटी होगी और लोगों की क्रय शक्ति बढ़ेगी।
वक्ताओं का कहना था कि देश में संसाधनों की कोई कमी नहीं है। आज जो हालात है उसने छोटे मझौले उद्योगों और असंगठित क्षेत्र को बर्बाद करके रख दिया है। जबकि देश का ज्यादातर हिस्सा अभी भी असंगठित क्षेत्र में ही काम कर रहा है। ऐसी स्थिति में यदि कॉरपोरेट घरानों पर टैक्स लगा तो देश में समृद्ध आ सकती है। उन्होंने कहा कि टीना फैक्टर की बात बेमानी है देश में वैकल्पिक नीतियों का निर्माण किया जा सकता है और देश की सम्प्रभुता की रक्षा की जा सकती है।
विचार व्यक्त किया गया कि आज जरूरत है कि बढ़ रहे पूंजी के एकाधिकार को खत्म किया जाए। देश में बहुत बड़ी संख्या ठेका मजदूरों की है जिन्हें न्यूनतम मजदूरी और सामाजिक सुरक्षा भी नहीं मिल पा रही है। सरकार को रोजगार के अधिकार का कानून बनाना चाहिए और हर नागरिक के रोजगार की गारंटी की जाए और यदि सरकार रोजगार न दे पाए तो कम से कम न्यूनतम मजदूरी का आधा बेरोजगारी भत्ते के रूप में दिया जाए। इसके लिए पुराने दृष्टिकोण को बदलने की जरूरत है और नई परिस्थिति के अनुसार प्रैक्सिस पर काम करना होगा। देश में पावर और वैल्थ कुछ लोगों के हाथ में संकेन्द्रित हो गई है और जब यह होगा तो लोकतंत्र भी सुरक्षित नहीं रह पाएगा। इसलिए रोजगार का यह आंदोलन लोकतंत्र को बचाने का भी आंदोलन है।
देखना है कि सरकार जन भावनाओं की कद्र करती है कि अभी भी धर्म, सम्प्रदाय, जाति का इस तरह की आवाजों को दबाने के लिए इस्तेमाल करती है!
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