खज्जिनाग का खजियार, हिमाचल
हमारे देश में ही नहीं, पूरी दुनिया में मिथकों और दंतकथाओं का वहाँ की संस्कृति के निर्माण में विशेष महत्व है। इन मिथकों और दंतकथाओं को वहाँ की संस्कृति से निकाल दीजिए तो संस्कृति काठ या पत्थर हो जाएगी, उसका आकर्षण छू-मंतर हो जाएगा। हमारे देश में तो इन कथाओं-कहानियों में ही सभ्यता-संस्कृति के प्राण बसते हैं।
हिमाचल प्रदेश का चम्बा जिला ऐसी अनेक मिथक कहानियों का खज़ाना है। अलौकिक प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर डलहौज़ी और खज्जियार भी ऐसी अनेक कहानियों को अपने आगोश में समेटे है!! विशेषकर खजियार या खज्जियार का तो जैसे निर्माण ही इन कथाओं से हुआ है।
भारत का 'मिनी स्विट्जरलैंड' कहे जाने वाले खजियार के बारे में कई अद्भुत कहानियां हैं जिन्हें यहाँ के निवासी 'इतिहास' मानकर दिल में संजोए हुए हैं।
कहते हैं सदियों पहले चम्बा जिला में एक राणे हुए। एक दिन इनकी दृष्टि लिली नामक गाँव के सामने पहाड़ पर पड़ी। वहाँ की एक टिमटिमाती रोशनी पर उनकी नज़र गड़ी रह गई। गड़ा हुआ खज़ाना समझकर जब वहॉं उन्होंने खुदाई की तो खुदाई के वक्त चार नाग प्रकट हुए।
इन चारों नागों को पालकी में डालकर जब वे चलने लगे तो आकाशवाणी हुई कि जहाँ इन नागों का वजन बहुत भारी हो जाएगा, वहाँ इन्हें छोड़ देना। सुकरेही नामक स्थान पर ऐसा ही हुआ और जब वहाँ इन चारों नाग देवता को छोड़ा गया तो वे चार दिशाओं में चले गए। कहते हैं कि चारों दिशाओं में जाने पर वे चार भाई मानव रूप में प्रकट हो गए। वे अलग-अलग चार गांवों क्रमशः जघुंई, जमुहार, खज्जियार और चुवाड़ी में बस गए!
खज्जियार पर पहले एक सिद्ध बाबा का नियंत्रण था। खज्जिनाग ने उन्हें सरपासे नामक एक खेल में हराया और स्वयं अपने बड़े भाई की मदद से खज्जियार पर नियंत्रण कर लिया। खज्जिनाग के नियंत्रण के पहले इस स्थान का पौराणिक नाम पूंपर था।
खजियार में स्थित झील के बारे में मान्यता है कि पहले यही शेषनाग अवतारी खज्जिनाग का वास था। अभी भी कुछ लोग खज्जिनाग को झील से निकलने पर उन्हें देखने का दावा करते हैं। मणिमहेश स्नान को यहां पर्व की तरह मनाया जाता रहा है तथा इस स्नान को पवित्र स्नान माना जाता है।
खज्जियार स्थित खज्जिनाग का मंदिर एक प्रसिद्ध मंदिर है और जो भी यहाँ आता है इस मंदिर में पूजाकर प्रसाद अवश्य पाना चाहता है। यद्यपि चम्बा जिले में अनेक नाग मन्दिर हैं जो यहाँ पाए जाने वाले नागों की महत्ता दर्शाते हैं, लेकिन खज्जियार स्थित खज्जिनाग मंदिर का विशेष महत्त्व है।
सन् 1641-64 के मध्य इस नाग मन्दिर का जीर्णोद्धार राजा पृथ्वीसिंह की धात्री(दाई) बाटलू ने करवाया। मन्दिर के गर्भगृह में खज्जिनाग की प्रस्तर की प्रतिमा स्थित है। मन्दिर के सुंदर खम्भों से टिकी हुई पांच पांडवों की आदमकद काष्ठ प्रतिमाएं इस मंदिर को और भी विशिष्ट बनाती हैं! यद्यपि मन्दिर का मूल स्थापत्य 12वी शताब्दी का माना जाता है किंतु मन्दिर प्रांगण में पांडवों की काष्ठ प्रतिमाओं को 16वीं शताब्दी में चम्बा नरेश बलभद्र बर्मन ने स्थापित करवाया।
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