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क्या आपके आसपास ब्रह्मराक्षस है?..(2)

             ब्रह्मराक्षस की मुक्ति-कथा

                 ब्रह्मराक्षस कविता 

भारतीय पौराणिक और मिथकीय कथाओं के इतने जीवन्त और सारगर्भित संकेतार्थ रहे हैं कि सदियां बीत जाने के बावज़ूद लोकमानस में उनकी जड़ें जमी हुई हैं। व्यापक जनता उनसे प्रेरणा लेती है, उनमें अपने जीवन के संदेश पाती है।

        ऐसे प्रसिद्ध और आकर्षक मिथकों में एक मिथक 'ब्रह्मराक्षस' है। हिंदी साहित्य के एक प्रमुख हस्ताक्षर गजानन माधव 'मुक्तिबोध' ने न केवल 'ब्रह्मराक्षस' शीर्षक एक प्रसिद्ध कविता लिखी है बल्कि अपनी अन्य कविताओं में भी ऐसे मिथकों का उपयोग किया है।

       आइए, आपको इस जीवन्त मिथकीय चरित्र से आपका परिचय कराते हैं और आपसे पूछते हैं कि आपने अपने गाँवों/कस्बों/शहरों में ऐसे नायब चरित्र को देखा-सुना है या नहीं?..टिप्पणी/कमेंट में अपनी राय/जिज्ञासा लिखकर ब्रह्मराक्षस की अवधारणा और भी जीवन्त और रोचक बनाएँ!


      कहते हैं प्राचीन काल में मध्यप्रदेश के एक गाँव में एक विशाल पीपल के पेड़ पर एक शापित ब्रह्मराक्षस रहता था। लोगों को कई बार उसके सुबकने और रोने की आवाजें सुनाई  दी थीं। कुछ लोगों जेठ की भरी सुनसान दोपहरी में उसका अट्टहास भी सुनाई दिया था। एक आदमी ने तो यह दावा किया कि वह ब्रह्मराक्षस से मिला था और उसने उस आदमी को लोहे की एक अँगूठी दी थी और कहा था कि इसे किसी को भी दिखाए बिना यदि तुम इसके साथ मुझे याद करोगे तो तुम्हारी एक इच्छा तुरन्त पूरी हो जाएगी।

        इस ब्रह्मराक्षस के बारे में एक बात कई बार सिद्ध हो चुकी थी कि शाम ढलने के बाद जिस किसी ने उस पीपल के पेड़ के नीचे जाने की कोशिश उसकी अकाल मृत्यु हो गई। कई लोगों ने उसे साँप, अजगर और उल्लू के रूप में भी देखा था।

     इसी गाँव में एक विद्वान पंडित रहता था। वह अत्यंत निर्भीक और साहसी भी था। एक दिन उसने सोचा कि क्यों न इस ब्रह्मराक्षस की सच्चाई अपनी आँखों से देखूँ। विद्वान व्यक्ति को केवल कही-सुनी बातों पर भरोसा न करके साक्षात् प्रमाण के आधार बार भरोसा करना चाहिए! ऐसा सोचते हुए भी अंदर ही अंदर उसे भय भी लग रहा था! एक रात वह मंत्र-जप करते हुए उस पीपल के पेड़ के नीचे पहुँच गया। वह मन ही मन उस ब्रह्मराक्षस के बारे में सोचने और प्रार्थना करने लगा। उसकी आँखें बंद थीं और उसके होंठों से अस्फुट स्वर में हनुमान चालीसा का पाठ हो रहा था। जैसे ही उसने 'भूत पिशाच निकट नहिं आवै। महावीर जब नाम सुनावै!!'- का उच्चारण किया तो एकाएक उसे आपने पीछे किसी विशेष आकृति का आभास हुआ। चौंककर वह पीछे मुड़ा तो सचमुच एक विशाल, भयानक आकृति दिखाई दी। वह डरता उससे पहले ही उस आकृति ने अट्टहास करते हुए कहा- ' रे मूर्ख, तू अपनी जान जोखिम में डालकर यहाँ क्यों चला आया?..'


         पंडित थोड़ा स्थिर होने पर लरजती आवाज़ में बोलने लगा, 'हे ब्रह्मराक्षस महाराज, मैंने सुना है कि आप शाप के कारण इस दशा को प्राप्त हुए हैं। मुझे सपने में रोज हनुमानजी दर्शन देते हैं और कहते हैं तू पीपल के पेड़ के नीचे जा, किसी को तेरी जरूरत है!..बताइए, में आपको कैसे शापमुक्त कर सकता हूँ?..'

         यह सुनकर ब्रह्मराक्षस की आकृति एक साधरण मनुष्य जैसी हो गई। वह रोने लगा! बोला, 'आजतक किसी ने भी मेरे बारे में ऐसा नहीं सोचा! मुझसे तो सिर्फ़ लोग डरते और नफ़रत करते हैं। कोई भी मुझे जानने तक यहाँ नहीं आता।'

        पंडित बोला- 'हे ब्रह्मराक्षस महाराज, में जानता हूँ कि आप एक विद्वान व्यक्ति हैं। कृपया बताएँ कि आपको यह शाप क्यों मिला?'

       ब्रह्मराक्षस बोला, 'हे विद्वान पंडित, तुम्हारा यह सवाल अति उत्तम है। संसार में लोग धन, वैभव या ज्ञान सम्पन्न होने पर अत्यंत अहंकारी हो जाते हैं। वे अपने आगे किसी को कुछ नहीं समझते!..लेकिन यह अहंकार एक दिन उनको कहीं का नहीं छोड़ता। मैं भी अपनी विद्वत्ता के अहंकार में चूर होकर लोगों का अपमान करता, उन्हें नीचा दिखाता और उनको तरह-तरह से उत्पीड़ित करता। चूँकि अपनी विद्वत्ता से मैंने खूब धन भी कमाया था, इसलिए अपने सामने किसी को कुछ नहीं समझता था!..'

        यह कहकर ब्रह्मराक्षस का सिर नीचे झुक गया और वह पश्चाताप करने लगा! उसको दुःखी और पश्चाताप करते देख विद्वान पंडित बोला, 'हे ज्ञानश्रेष्ठ, आप दुःखी न हों। वस्तुतः आपके पास भगवान ने यह ज्ञान पाने के लिए ही भेजा है। मेरे अंदर भी अहंकार के बीज अंकुरित होने लगे थे!...मैं आपको एक अनूठा मंत्र दे रहा हूँ। यद्यपि आप सब कुछ जानते है लेकिन सिर पर जब अहंकार सवार हो जाता है तो एक दिन वह अहंकार गधा बनकर उसकी स्मृति भ्रष्ट कर देता है!...'

         ब्रह्मराक्षस को जैसे कुछ याद आने लगा था। उसने व्यग्र होकर कहा, 'हे कृपालु पण्डित, कृपया मुझे वह मंत्र सुनाएँ जिसके आधार पर मेरा उद्धार हो सके!..'

        पण्डित बुदबुदाते हुए उससे  कहा- 'यह मंत्र आप भी मेरे साथ दोहराइए!..आप शापमुक्त हो जायेंगे। मेरे हृदय में स्थित ईश्वर ऐसा ही निर्देश मुझे दे रहे हैं!..'

        यह कहकर पण्डित " ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय, ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय!" मंत्र से जैसे-जैसे उसे अभिसिंचित करने लगा, वह स्वयं भी अपनी पूर्व चेतना में लौटने लगा। पूर्ण चेतना में आने पर उसने देखा कि भोर हो चुकी है। अनेक  ग्रामवासी उसे घेरे खड़े हैं। उसे ब्रह्मराक्षस के स्थान पर कुछ ताजा पुष्प दिखाई दिए। उसे यह भी लगा कि जैसे ब्रह्मराक्षस मनुष्य के रूप में मुस्कराते हुए उसे धन्यवाद दे रहा है।

          लोगों ने देखा कि वायुमंडल का एक गोला पीपल के पेड़ की ऊंचाइयों तक सरसराते हुए उठा और आसमान में विलीन हो गया।...

                     ★★★★★★★★★

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