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चुन रे धागा, बुन

                          अरे चुन रे धागा, बुन रे-रे चुन-चुन रे धागा बुन!.. कान लगा ले पूरब-पच्छिम पूरब-पच्छिम रे उत्तर-दक्खिन चारों तरफ तो शोर ही शोर रे तू ध्यान लगा के सुन! चुन रे धागा, बुन रे-रे चुन-चुन रे धागा बुन!.. वे गीधे जो पच्छिम में थे उत्तर में थे दक्खिन में थे तेरे पुरब में मड़राएं रे निगलें सूरज दें अवगुन! चुन रे धागा, बुन रे-रे चुन-चुन रे धागा बुन!.. कहत कबीर तू सुन रे संता मत बन रे अंखियन का अंधा अंधियारे में आग लगा दे रे छेड़ दे भोर की धुन! चुन रे धागा, बुन रे-रे चुन-चुन रे धागा बुन!..          ★★★★★★  

मुझसे जीत के दिखाओ!..

कविता:                     मैं भी चुनाव लड़ूँगा..                                  - अशोक प्रकाश      आज मैंने तय किया है दिमाग खोलकर आँख मूँदकर फैसला लिया है 5 लाख खर्चकर अगली बार मैं भी चुनाव लड़ूँगा, आप लोग 5 करोड़ वाले को वोट देकर मुझे हरा दीजिएगा! मैं खुश हो जाऊँगा, किंतु-परन्तु भूल जाऊँगा आपका मौनमन्त्र स्वीकार 5 लाख की जगह 5 करोड़ के इंतजाम में जुट जाऊँगा आप बेईमान-वेईमान कहते रहिएगा बाद में वोट मुझे ही दीजिएगा वोट के बदले टॉफी लीजिएगा उसे मेरे द्वारा दी गई ट्रॉफी समझिएगा! क्या?..आप मूर्ख नहीं हैं? 5 करोड़ वाले के स्थान पर 50 करोड़ वाले को जिताएँगे? समझदार बन दिखाएँगे?... धन्यवाद... धन्यवाद! आपने मेरी औक़ात याद दिला दी 5 करोड़ की जगह 50 करोड़ की सुध दिला दी!... एवमस्तु, आप मुझे हरा ही तो सकते हैं 5 लाख को 50 करोड़ बनाने पर बंदिश तो नहीं लगा सकते हैं!... शपथ ऊपर वाले की लेता हूँ, आप सबको 5 साल में 5 लाख को ...

हारे हुए लोग

एक कविता~अकविता :                                                 ये हारे हुए लोग कभी अपनी हार नहीं मानते..   'निश्चित विजय' के लिए ये फिर-फिर अपनी कमर कसते हैं दुनिया के ये अजूबे लोग घटनाओं पर नहीं सिद्धांत पर भरोसा करते हैं किसी व्यक्ति की जगह सभ्यता के विकास के लिए जीते-मरते हैं... रक्तबीज हैं ये आधा पेट खा और कुछ भी पहनकर देश और दुनिया नापते हैं चिंगारी की तरह यहाँ-वहाँ बिखरे इन अग्निदूतों से दुनिया के सारे शासक काँपते हैं! अज़ीब हैं ये लोग कभी अपनी हार  नहीं मानते हैं पूरी दुनिया के जंगल पहाड़ खेत मैदान इन्हें पहचानते हैं प्राकृतिक रूप से खिलते फूल तितलियां भौंरे कीट हवाओं में तैरते दूर देश के  गीत संगीत इनके साथ  अमर-राग के सुर तानते हैं! अज़ीब हैं ये लोग! - अशोक प्रकाश                     ★★★★★★

किसानों के इन नारों में है असली कविता

             किसान आंदोलन की कविता                            1. जो अन्न – वस्त्र उपजाएगा, अब सो कानून बनाएगा। भारतवर्ष उसी का है, अब शासन वही चलाएगा ।                                      ~ सहजानंद सरस्वती 2.   हम पर न दया करो, न तरस खाओ हमारा हक़ छीना जा रहा है, हमारे साथ आओ!.. 3.   खाद-बीज-बिजली-डीज़ल-कीटनाशक सब पर जिनका अधिकार है, किसान की मेहनत के लुटेरे हैं वे,  इन मुनाफाखोरों का  किसान शिकार है!... 4.   कॉरपोरेट को अपनी उत्पादन-लागत-मजदूरी के अनुसार मुनाफ़ा जब तय करने का अधिकार है, ये कौन सा खेल है भाई, फसल की एमएसपी तक की कानूनी गारंटी के लिए  देश की सरकार भी नहीं तैयार है?...  5. जब किसान को मिलेगी सुनिश्चित आय कर्जा-मुक्त होंगे जब सभी किसान, फसल का मिलेगा जब पूरा दाम  तभी सचमुच होगा किसान का सम्मान!..    6. विकास का सार...