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चुन रे धागा, बुन

                          अरे चुन रे धागा, बुन रे-रे चुन-चुन रे धागा बुन!.. कान लगा ले पूरब-पच्छिम पूरब-पच्छिम रे उत्तर-दक्खिन चारों तरफ तो शोर ही शोर रे तू ध्यान लगा के सुन! चुन रे धागा, बुन रे-रे चुन-चुन रे धागा बुन!.. वे गीधे जो पच्छिम में थे उत्तर में थे दक्खिन में थे तेरे पुरब में मड़राएं रे निगलें सूरज दें अवगुन! चुन रे धागा, बुन रे-रे चुन-चुन रे धागा बुन!.. कहत कबीर तू सुन रे संता मत बन रे अंखियन का अंधा अंधियारे में आग लगा दे रे छेड़ दे भोर की धुन! चुन रे धागा, बुन रे-रे चुन-चुन रे धागा बुन!..          ★★★★★★  

ताज का राज

                 केवल संख्या बल से कुछ                    नहीं होता!.. केवल संख्या-बल से कुछ नहीं होता हिंदुस्तानियों.. अंग्रेज़ तुमसे बहुत कम थे! अन्य देशों से आकर राज क़ायम करने वाले दूसरे शत्रु भी! कबूतर हमेशा नहीं उड़ जाया करते बहेलिए का जाल लेकर!.. अक्सर शिकारी के शिकार बनते हैं या उनके रहमोकरम पर दाना चुनते हैं! इन दिनों ही देखो, कितने कम हैं तुम पर  राज करने वाले उनसे भी बहुत कम हैं उन्हें राज का ताज पहनाने वाले! अगर तुम नहीं समझ सकते लोकतांत्रिक ताज़ का राज़ तो बहुमत का गणित-तंत्र तो समझने की कोशिश करो... अस्सी करोड़ से ज़्यादा बिना दया के राशन के नहीं रह पाएंगे, इसकी हकीकत इसकी परिस्थिति तो समझो!.. मत लड़ो उनके इशारों पर जिन्होंने सदियों सिर्फ़ धोखा दिया है राजमहल में रहने वालों ने सोचो, तुम्हारे साथ और क्या-क्या किया है...   सोचो कि आज नौकरी भी कितनी बची है तुम्हारे पास सर पर छत की जमीन भी नहीं और उन्होंने एक और पुष्पक विमान की कल्पना रची है!... जबकि चन्द्रमा और मंगल सिद्ध हो चुके ह...

मुझसे जीत के दिखाओ!..

कविता:                     मैं भी चुनाव लड़ूँगा..                                  - अशोक प्रकाश      आज मैंने तय किया है दिमाग खोलकर आँख मूँदकर फैसला लिया है 5 लाख खर्चकर अगली बार मैं भी चुनाव लड़ूँगा, आप लोग 5 करोड़ वाले को वोट देकर मुझे हरा दीजिएगा! मैं खुश हो जाऊँगा, किंतु-परन्तु भूल जाऊँगा आपका मौनमन्त्र स्वीकार 5 लाख की जगह 5 करोड़ के इंतजाम में जुट जाऊँगा आप बेईमान-वेईमान कहते रहिएगा बाद में वोट मुझे ही दीजिएगा वोट के बदले टॉफी लीजिएगा उसे मेरे द्वारा दी गई ट्रॉफी समझिएगा! क्या?..आप मूर्ख नहीं हैं? 5 करोड़ वाले के स्थान पर 50 करोड़ वाले को जिताएँगे? समझदार बन दिखाएँगे?... धन्यवाद... धन्यवाद! आपने मेरी औक़ात याद दिला दी 5 करोड़ की जगह 50 करोड़ की सुध दिला दी!... एवमस्तु, आप मुझे हरा ही तो सकते हैं 5 लाख को 50 करोड़ बनाने पर बंदिश तो नहीं लगा सकते हैं!... शपथ ऊपर वाले की लेता हूँ, आप सबको 5 साल में 5 लाख को ...

गोरखनाथ का एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण पद

     नाथ सम्प्रदाय                          https://youtu.be/8v9W0acjctQ गोरखनाथ की रचनाएं ' गोरखनाथ का पद- ' मनसा मेरी व्यौपार बांधौ...'                                 पद का तात्पर्य एवं                                           व्याख्या: यह कविता नाथ सम्प्रदाय के सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण कवि गुरु गोरखनाथ के प्रसिद्ध पदों में से एक है। इस पद को डॉ पीताम्बर दत्त बड़थ्वाल द्वारा 'पद ' शीर्षक रचना में स्थान दिया गया है। कविता में  गुरु गोरखनाथ ने अपनी साधना-पद्धति का पक्ष-पोषण करते हुए मन की इच्छाओं को साधनारत होने के लिए कहा है। इसमें वे अपने मन को ही संबोधित करते हुए उसे योग साधना में लीन होने तथा  प्रकारांतर से समस्त मनुष्यों को  सांसारिक मायाजाल से दूर रहने का उपदेश देते हैं।         ...