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ब्रह्मराक्षस कौन है?..(1)

गजानन माधव 'मुक्तिबोध'~ कविता:  

             'ब्रह्मराक्षस'


गजानन माधव 'मुक्तिबोध' हिंदी के ऐसे कवि हैं जिनकी कविताओं का मर्म भेदने के लिए कविता के शब्दों से अधिक मुक्तिबोध के मानस में उतरना पड़ता है। उनकी कविताओं के शब्द एक पर्दे की तरह हैं जिनको खोले बिना आप उनके पीछे का संसार नहीं देख सकते, उसके सौंदर्य को नहीं परख सकते। केवल शब्दों से उनके काव्य-सौंदर्य की थाह लगा लेना उसी तरह मुश्किल है जैसे किसी कमरे के पर्दे के बाहर से कमरे के भीतर की स्थितियों को जानने की कोशिश करना। उनके शब्द अनुमान का साधन मात्र हैं, प्रत्यक्ष का अनुभव कराने के साधन नहीं-

उद्भ्रांत शब्दों के नए आवर्त में
हर शब्द निज प्रति शब्द को भी काटता,
वह रूप अपने बिंब से भी जूझ
विकृताकार-कृति
है बन रहा...
               
            - 'ब्रह्मराक्षस'

मुक्तिबोध की कविताओं में ऐसे ही शब्दों के अनेक आवर्त-चक्र मिलते हैं जो उनकी कविताओं के नए पाठकों को चकरा देते हैं। कविताओं के शब्द अपने ही नए शब्दों से उनके अर्थों को काटते से प्रतीत होते हैं। रूप और बिम्ब आसानी से स्पष्ट नहीं हो पाते, पूरी रचना एक विकृत आकार लेती हुई सी लगती है।...यह मुक्तिबोध की के कथ्य का ऐसा तथ्य है जो उनकी कविताओं को आच्छादित किए रहता है, मात्र 'ब्रह्मराक्षस' के शब्दों को ही नहीं। उनकी कविताएं- 'अंधेरे में' और 'ब्रह्मराक्षस' ऐसी ही कविताएँ हैं जिनका मर्म शब्दों से अधिक उन विचारों से समझा जा सकता है जिसके जमीनी संघर्षों को समझने के लिए मुक्तिबोध जीवन के आखिरी क्षण तक जूझते रहे। 'मुक्तिबोध की डायरी' के अनेक पन्ने इसकी गवाही देते हैं।  उनके काव्यशिल्प को 'फैंटेसी' कहा गया है किंतु फैंटेसी से अधिक मुक्तिबोध का काव्य अंतर्द्वंद्वों की कलात्मक अभिव्यक्ति है। वह स्वप्नलोक में नहीं विचरते रहते बल्कि संघर्ष की जमीन पर खड़े होकर नए युग के संघर्षों में जूझते हैं, उनका काव्यशिल्प इसी संघर्ष की उपज है। यह मध्यवर्गीय बुद्धिजीवी का ही अंतर्द्वंद्व नहीं है बल्कि उस पूरे भारतीय समाज का है जो आज भी बदलाव के झंझावातों से जूझ रहा है।

               हिंदी साहित्य में मुक्तिबोध के काव्य-संघर्ष जैसा
 कोई और उदाहरण नहीं। बांग्लाभाषा की लेखिका महाश्वेता देवी की कथाओं में यह संघर्ष कदाचित मिलता है, किन्तु दोनों की साहित्य-भूमि अलग है। वैचारिक संघर्ष महाश्वेता देवी की रचनाओं में भी मुखर हैं और मुक्तिबोध की रचनाओं में भी, किन्तु मुक्तिबोध की रचनाओं का संघर्ष किसी निर्णय तक न पहुंच आत्मसंघर्ष तक सीमित रहता है, वहीं महाश्वेता देवी का वैचारिक संघर्ष कभी अनिर्णय में नहीं खो जाता। मुक्तिबोध में वैचारिक संघर्षों की पूर्वपीठिका है, महाश्वेता देवी में उसका उपसंहार! मुक्तिबोध का काव्य जहाँ बुद्धिजीवियों के आत्मसंघर्ष की अभिव्यक्ति है, वहीं महाश्वेता देवी का साहित्य बुद्धिजीवियों के आत्मसंघर्ष को जनता के संघर्षों का आइना दिखाता है।

ब्रह्मराक्षस:

'ब्रह्मराक्षस' कवि मुक्तिबोध की मानस चेतना में बसा एक ऐसा विद्रोही है जो संघर्षों में हार तो जाता है, लेकिन हार मानता नही! सामाजिक विद्रोह में निर्वासन उसे स्वीकार है, आत्म-समर्पण नहीं। वह अंधकार में भी चाँदनी की उम्मीद रखता है।......

          'ब्रह्मराक्षस' कविता की शुरुआत में जिस परित्यक्त बावड़ी का का वर्णन हुआ है, वह बावड़ी वैचारिक आत्मसंघर्ष की बावड़ी है। यह वैचारिक संघर्ष अंतिम छोर तक पहुँचने का साहस वैसे ही नहीं करता जैसे ब्रह्मराक्षस बावड़ी के पानी में उतर कर उसे देखने का साहस नहीं कर पाता। मध्यमवर्गीय बुद्धिजीवियों की कदाचित यही स्थिति है। कवि के शब्दों में-

                         " सीढ़ियाँ डूबीं अनेकों
                            उस पुराने घिरे पानी में...
                            समझ में आ न सकता हो
                            कि जैसे बात का आधार
                            लेकिन बात गहरी हो... "

- 'बात का आधार' केवल ब्रह्मराक्षस को ही नहीं समझ में आता, द्वंद्व में फंसे बुद्धिजीवी को भी नहीं समझ आता। दरअसल, इस समझदारी में भी बहुत कुछ टूट-छूट जाने का खतरा है। कबीर कहते हैं-
         "जिन खोजा तीन पाइयां गहरे पानी पैठ।
          मैं बपुरा बूड़न डरा, रहा किनारे बैठ।।"...

पता है, बात गहरी है और मोती की तरह है। लेकिन उसके पहले तैराक की जान का खतरा भी है। मुक्तिबोध बुद्धिजीवियों के इस यथार्थ को जानते-मानते हैं। वे इस ब्रह्मराक्षस के तटस्थ दृष्टा नहीं हैं, उसके दिल का हाल जानते हैं। उसके 'अधूरे कार्य' को पूरा करने का संकल्प भी वे इसीलिए लेते हैं।...

...मुक्तिबोध के मन में क्रांति का 'रक्त-प्लावित स्वर' बसता है।          

                               ★★★★★★★

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