श्रीकृष्ण-कथा: हर लेती मन की व्यथा!
राधा-कृष्ण प्रेम में है छुपा
गूढ़ सामाजिक संदेश
भांडीरवन के समीप वंशीवट का वह शांत, सुरम्य प्रदेश संध्या की स्वर्णिम आभा में नहाया हुआ था। यमुना की मंद लहरें किनारे से टकराकर जैसे कोई अनसुना गीत गा रही थीं। कदम्ब वृक्षों की छाया में शीतल समीर पुष्पों की सुगंध लेकर बह रही थी। पक्षियों का कलरव धीरे धीरे मौन में विलीन हो रहा था, मानो सम्पूर्ण प्रकृति किसी दिव्य क्षण की प्रतीक्षा कर रही हो।
उस वंशीवट के नीचे श्यामसुंदर श्रीकृष्ण खड़े थे। उनके अधरों पर वंशी सजी थी और उससे निकलती मधुर तान केवल संगीत नहीं थी, वह प्रेम का निमंत्रण थी, आत्मा का आह्वान थी। प्रत्येक स्वर जैसे एक ही नाम पुकार रहा था, "राधे... राधे..."
गौएँ चरना छोड़कर उसी ओर निहारने लगीं। मयूर अपने पंख फैलाकर स्थिर हो गए। वृक्षों की पत्तियाँ तक हिलना भूल गईं। ऐसा प्रतीत होता था कि स्वयं समय भी उस मधुर वंशी के सम्मोहन में ठहर गया हो।
किन्तु आज वह प्रतीक्षा कुछ लंबी हो गई।
एक घड़ी बीत गई।
श्रीकृष्ण ने वंशी अधरों से हटाई। उनके नेत्र दूर पगडंडी पर टिक गए। तभी धूल भरे मार्ग पर एक परिचित आकृति दिखाई दी।
राधा थीं।
पर आज उनके मुख पर वह सहज मुस्कान नहीं थी। नेत्र कुछ नम थे और चरणों की गति भी बोझिल थी। वे धीरे धीरे चलकर कृष्ण के समीप पहुँचीं।
कृष्ण ने स्नेहभरी दृष्टि से उन्हें देखा और कोमल स्वर में पूछा,
"क्या हुआ राधे? आज तुम्हारे मुख पर यह उदासी कैसी?"
राधा कुछ क्षण मौन रहीं। फिर उनकी आँखों से एक अश्रुबिंदु ढुलक पड़ा।
"और क्या कान्हा... उस झूठे रिश्ते ने आज फिर मेरे पैरों में बेड़ियाँ डालनी चाहीं। समाज के बंधन, लोकलाज, अपने और पराए का भ्रम... सबने मुझे रोकना चाहा। ऐसा लगा जैसे मेरे कदम तुम्हारी ओर बढ़ ही नहीं पाएँगे।"
वे कुछ रुकीं और कृष्ण की ओर प्रेम से देखकर बोलीं,
"किन्तु जब मन ही मन तुम्हारा नाम पुकारा, तब न जाने कैसी शक्ति मिली। वे सब बंधन ढीले पड़ गए और मैं किसी तरह तुम्हारे पास चली आई।"
श्रीकृष्ण मंद मुस्कराए।
उन्होंने समीप पड़े एक सूखे पत्ते को उठाकर यमुना की धारा में छोड़ दिया।
"राधे, देखो। यह पत्ता जब तक शाखा से जुड़ा था, स्वयं को वृक्ष का स्वामी समझता था। अब धारा में बहते हुए उसे ज्ञात हो रहा है कि उसकी अपनी कोई दिशा नहीं।"
राधा ध्यानपूर्वक सुनती रहीं।
कृष्ण बोले,
"यह संसार भी ऐसा ही है। यहाँ जितने भी संबंध हैं, वे समय के साथ बदलते रहते हैं। कोई संबंध जन्म से बनता है, कोई परिस्थिति से और कोई स्वार्थ से। इनका सम्मान करना चाहिए, पर इन्हें अंतिम सत्य समझ लेना ही बंधन है।"
"माया की सबसे मजबूत बेड़ियाँ लोहे की नहीं होतीं, वे मन की होती हैं। 'मैं' और 'मेरा' का अभिमान ही उन्हें गढ़ता है।"
राधा ने पूछा,
"तो क्या संसार के सभी रिश्ते झूठे हैं?"
कृष्ण ने धीरे से सिर हिलाया।
"नहीं राधे। जो संबंध भगवान तक ले जाए, वह सत्य है। जो भगवान से दूर करे, वह केवल मोह है। प्रेम बंधन नहीं बनता, वह तो मुक्त करता है। मोह बाँधता है, प्रेम उड़ना सिखाता है।"
राधा की आँखों में अब जिज्ञासा थी।
"और इन बेड़ियों से मुक्ति कैसे मिले कान्हा?"
कृष्ण ने पुनः वंशी अधरों से लगाई। कुछ क्षण मधुर स्वर गूँजते रहे। फिर बोले,
"जैसे अंधकार को हटाने के लिए उससे लड़ना नहीं पड़ता, केवल दीप जलाना पड़ता है; वैसे ही माया से लड़ने की आवश्यकता नहीं। केवल भगवान का स्मरण करो। जहाँ सच्चा नाम-स्मरण है, वहाँ बंधन स्वयं ढीले पड़ जाते हैं।"
"जो प्रत्येक परिस्थिति में प्रभु को याद रखता है, उसके लिए संसार सेवा का स्थान बन जाता है, कारागार नहीं।"
राधा ने नेत्र बंद कर लिए। उनके अधरों पर सहज मुस्कान लौट आई। मन का सारा बोझ जैसे यमुना की धारा में बह गया।
उन्होंने कहा,
"अब समझ गई कान्हा। मुझे संसार से भागना नहीं है, उसके बीच रहकर भी तुम्हें नहीं भूलना है।"
कृष्ण ने प्रेम से कहा,
"यही योग है राधे। हाथ कर्म में रहें, मन भगवान में रहे। तब कोई बेड़ी तुम्हें बाँध नहीं सकती।"
संध्या अब गहराने लगी थी। यमुना के जल पर चन्द्रमा की पहली किरण उतर आई। श्रीकृष्ण ने पुनः वंशी बजानी आरम्भ की। इस बार राधा उनके समीप थीं।
उस दिव्य वंशी की ध्वनि मानो समस्त संसार से कह रही थी,
"जो प्रभु का नाम पकड़ लेता है, संसार की प्रत्येक बेड़ी उसके चरणों से स्वयं टूट जाती है। प्रेम ही वास्तविक मुक्ति है, और भगवान का स्मरण उस प्रेम का अमृतमय द्वार।"
~ कृष्णानंद

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