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इस इंद्रजाल को कैसे तोड़ेंगे आप?..

                 राजसत्ता का इंद्रजाल

               क्या तोड़ पाएँगे?

 

 
सच यही है कि वे जो कुछ कर रहे हैं पूरे इत्मिनान और भरोसे के साथ कर रहे हैं! उनमें जनता के विरोध या विद्रोह की कोई चिंता नहीं!..

वे  सोचते हैं कि राजा को राजा की तरह रहना चाहिए और प्रजा को प्रजा की तरह!...प्रजातंत्र का यह मतलब थोड़ी है कि प्रजा प्रजा न रहे, राजा होने की कोशिश करे!..

उनकी सोच है कि परमात्मा ने जिसे जो करने के लिए भेजा है, वह वही करेगा- वही कर पाएगा! सब अम्बानी-अदानी थोड़ी हो जाएंगे?...देश संभालना कोई आसान काम है क्या?...जबकि लोग एक घर नहीं संभाल पाते तो जिसे देश सम्भालने का जिम्मा परमात्मा द्वारा मिला है, वह जो कुछ कर रहा होगा- ठीक ही कर रहा होगा!...

उसकी मर्ज़ी के बगैर जब एक पत्ता तक नहीं हिलता तो कोई बैंक या सार्वजनिक संस्थान अपने आप डूब सकता है?...भगवान की मर्ज़ी से ही व्यवस्था संभालने का जिम्मा मिलता है और उसकी इच्छा से ही राजकाज चलता है!...

चीखने वालों को यह समझना चाहिए कि वे भगवान की मर्ज़ी पर सवाल उठा रहे हैं। उन्हें यह भी समझना चाहिए कि परमात्मा किसी भी देश-दुनिया से ऊपर की चीज, इन सबसे बड़ा है।

जो यह नहीं समझते वे केवल अज्ञानी नहीं, उसकी इच्छा के खिलाफ सोचने के अपराधी हैं, पापी हैं!..ऊपर वाला उनके साथ न्याय जरूर करेगा, आज नहीं तो कल और ठीक-ठीक न्याय करेगा!.. एक जज भी उसकी इच्छा का ही पालन करता है।..और पूरा शासनतंत्र भी तो परमात्मा की मर्जी से बनता है!..

क्या इसमें कुछ गलत है?...

जी नहीं, वे ऐसा ही समझते और मानते हैं। उनके अनुयायी भी ऐसा मानते और समझते हैं। वे धर्म के साथ राज चलाते हैं, इसी को राजधर्म कहते मानते हैं!..इसीलिए हत्याएँ, बलात्कार, भ्रष्टाचार सब पर उनकी नपी-तुली प्रतिक्रिया होती है- ' परमात्मा की मर्जी के बगैर एक पत्ता तक नहीं हिल सकता!..' परमात्मा भी हैरान होते होंगे उनके इस विश्वास पर!

लेकिन सदियों से पिलाई गई थींयह घुट्टी एक ऐसी संजीवनी है जिसका एक घूँट पीकर भी वे अमरत्व प्राप्त कर लेेतेे हैं। या कम से कम मोक्ष-प्राप्ति की कामना करते हुए दुनियावी माया-मोह से दूर होने का भाव प्राप्त कर लेते हैं। यथास्थितिवाद का यह गुलगुला खाते हुए जो जहाँ है वहीं रहे और खुश रहे की एक ऐसी भावना से वे संतृप्त होते हैं जिसने सदियों उन्हें सुलाए रखा! 'हर इच्छा भगवान की...' - कहते हुए वे संतोष की एक ऐसी नींद के आगोश में चले जाते हैं जिसे अफ़ीम जैसा नशा समझना अफ़ीम की तौहीन है!...

गफ़लत में मत रहिए, होली में भोले की बूटी चढ़ाइए और सिर नवाइए!... सिर धुनने से नशा नहीं जाने का, पूरी बाल्टी रंग उड़ेलने से भी कुछ नहीं होना!...

तमाम ओझा-वैद्य घूम-फिर फिर वहीं पहुंचे, जहाँ उन्होंने चाहा।

क्या आप कुछ और उपाय कर सकते हैं इस इंद्रजाल को काटने का?... 

ध्यान रखिएगा, जादुई चिराग उन्हीं के पास है!
                   
   ★★★★★★★

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