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कड़वी बात: हम सच कब स्वीकार करेंगे?

       क्या गौतम बुद्ध भगवान हैं?


                 https://youtu.be/qKJpbmtDCDA


गौतम बुद्ध को आज प्रायः भगवान बुद्ध कहा और माना जाता है! यद्यपि बौद्ध स्वयं को नास्तिक कहते हैं और ईश्वर के अस्तित्व को इंकार करते हैं फिर भी वे गौतम बुद्ध को भगवान बुद्ध कहते हैं! क्यों?...इसके उत्तर में कुछ बौद्धों का कहना है कि ईश्वर शब्द का अलग अर्थ होता है और भगवान का अलग। देश-दुनिया में तो दोनों का मतलब एक ही समझा जाता है। या फिर बाबा रामदेव तथा मध्यकालीन संतों की तरह जगत के कण-कण में भगवान या परमेश्वर की अवधारणा को स्वीकार करते हुए राम-कृष्ण-महात्म्य गांधी-डॉ आंबेडकर सबको जो चाहें सो भगवान/ईश्वर की उपाधि देते हुए उन्हें पूजें। लेकिन दोनों विचार तो एक साथ नहीं हो सकते-है भी, नहीं भी है! अन्यथा 'अस्ति-नास्ति' की अवधारणा बना जो चाहो सो मानो।
          अपनी प्रसिद्ध पुस्तिका 'तुम्हारी क्षय' में प्रसिद्ध बुद्धानुयायी राहुल सांकृत्यायन का एक लेख है- 'तुम्हारे भगवान की क्षय'! वे इस लेख में लिखते हैं- "अज्ञान का दूसरा नाम ही ईश्वर है। हम अपने अज्ञान को साफ स्वीकार करने में शर्माते हैं, अतः उसके लिए संभ्रान्त नाम 'ईश्वर' ढूँढ़ निकाला गया है। ईश्वर-विश्वास का दूसरा कारण मनुष्य की असमर्थता और बेबसी है।" दूसरे समुदायों की तो बात ही छोड़िए, क्या बौद्ध आज भी भगवान या ईश्वर के बारे में ऐसी ही समझ रखते हैं? गौतम बुद्ध को प्रायः 'भगवान बुद्ध' कहा जाता है। तो क्या भगवान अलग हैं और ईश्वर अलग?

सवाल है, क्या गौतम बुद्ध भगवान थे या हैं?...
क्या वे परमात्मा या परमेश्वर हैं?...



हम सबको जानना चाहिए कि गौतम बुद्ध किसी ईश्वर या भगवान में विश्वास नहीं करते थे। वे किसी आत्मा को भी नहीं मानते थे। उनके अनुसार जिसे हम आत्मा समझते हैं वह 'विचारों का प्रवाह' मात्र है!

फिर वे भगवान कैसे हुए?...अंधभक्तों की यही माया होती है। अपने फ़ायदे के लिए अपने गुरुओं के विचारों का सत्यानाश करके भी वे अपना वर्चस्व बनाए रखते हैं!...
कुछ बौद्धों का कहना है कि ईश्वर का मतलब अलग है, और भगवान का मतलब अलग!...किन्तु हकीकत हम सभी जानते हैं कि कम से कम भारत में ईश्वर मतलब भगवान और भगवान मतलब ईश्वर ही होता है! एक पारलौकिक शक्ति जो हमारा कल्याण करती है। बाकी बकवास करने के लिए तो ईश्वर, परमात्मा, भगवान की अनंत व्याख्याएं की जा सकती हैं, की गई हैं!

फिर यह कुतर्क क्यों?...

स्पष्ट है कि यह वन्दना-पूजा बुद्ध के विचारों का निषेध है, 
उसका अनुगमन नहीं! इसीलिए आज स्वस्तिक धारण किए गौतमबुद्ध का भी प्रचार-प्रसार किया जाता है और उनके तथाकथित अनुयायी समझ भी नहीं पाते कि वे मूर्खों के फंदे में फंस स्वयं भी वही मूर्खता कर रहे है!

 बुद्ध भी  एक देवी-देवता की तरह पूजे जाते हैं और शांति के नाम पर उनके विचारों और ख्याति का दुरुपयोग प्रगतिशील विचारों का दमन करने के लिए किया जाता है। यह प्रतिक्रियावादी शक्तियों का बना-बनाया ढर्रा है कि इतिहास के सारे प्रगतिशील तत्वों का या तो वे अपने अधोगामी उद्देश्यों के लिए उनका इस्तेमाल कर लेते हैं या फिर उन्हें नष्ट कर देते हैं! 

खासतौर पर बुद्ध के सच्चे अनुयायियों को यह समझना चाहिए कि गौतम बुद्ध के सिद्धांत आत्म-मंथन की सीख देते हैं न कि किसी अहंकारी के सामने आत्मसमर्पण की! वे किसी एक और भगवान की वन्दना-आराधना में डूबे रहने की भी शिक्षा नहीं देते! फ़िलहाल, किसान आंदोलन के संदर्भ में आज बौद्धधम्म की यही सीख काम की है!


                             ★★★★★★★★

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