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एक क्रीमीलेयर का बयान:



                     ⚫     आरक्षण बनाम विरोध   

                                                    - हर्ष बर्द्धन

 

            मेरा बेटा इस बार बारहवीं में था और अब कम्पटीशन की तैयारी कर रहा है। क्योंकि अब हम क्रीमी लेयर में आते हैं, अतः वह अब आरक्षण का लाभ नहीं ले सकता। एक दिन मुझे उसने कटऑफ का अंतर दिखाया और वह भी आरक्षण-विरोधियों की ही भांति कुंठित हो गया। उसको मैने समझाया कि अगर वह ऊपर के 50 प्रतिशत में अपनी जगह नहीं बना सकता तो फिर कुछ और करने की जरूरत है और यह बात उसकी समझ में आ गयी और अब वह अच्छा कर रहा है।...

                 मैने कुछ विश्लेषण किया है और पाया कि ज्यादातर लोग आरक्षण का विरोध तभी करते हैं जब उनके बच्चे बारहवीं में होते हैं और वह सारी सुविधाओं के बावजूद औसत ही होते हैं। कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो आरक्षण का लाभ लेने के बावजूद समाज में अपने को फारवर्ड दिखाने के चक्कर में अपनों का विरोध करने लगते हैं।
           रही बात फारवर्ड क्लास की तो वह यूँ ही फारवर्ड नहीं है! इस वर्ग ने ऐसा चक्कर चलाया है कि लोगों को समझ ही नहीं आता की हो क्या रहा है! जितना में समझ पाया हूँ वह कुछ यूँ है -

1. अगर किसी अयोग्य को आई ए एस बनाये तो काम-काज बाधित होता है! ऐसे में आई ए एस के बेटे को ही आई एस बनने दो वह अपने पिताजी या माताजी से तो अच्छा ही होगा। एस सी भी खुश काम-काज भी बाधित नहीं!

2. इससे आरक्षितों में एक नया अभिजात्य वर्ग तैयार हो गया और फारवर्ड क्लास के लोगों को भी इन लोगों के यहाँ शादी ब्याह तक करने में दिक्कत नहीं होती है! फिर यही वर्ग अपनों के हितों के खिलाफ काम करने लगता है।

3.सरकारी नौकरियों की संख्या को बहुत हद तक सीमित कर देना। ना रहेगी नौकरी, ना आरक्षण!

4. पढ़ाई को इतना महंगा और गरीबों से दूर कर दो कि वह सिर्फ अपने भाग्य को कोसता रहे!  (भगवान का कांसेप्ट इसी तरह के लोगों के लिए है)।

5. निजीकरण पर जोर देना ताकि गरीबों व अछूतों को नौकरियों से दूर रखा जा सके।

वैसे इस आरक्षण का एक लाभ भी है। अपने बच्चों की अकर्मण्यता को आरक्षण के मत्थे मढ़ देने का!!! नहीं तो कोई भी अपने बच्चों को क्लास में फिसड्डी  रखने के लिए क्यों लड़ेगा?.... ◆◆◆

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