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कृष्ण-कथा: हर लेती मन की व्यथा

                         भांडीर वन में      

          राधा-कृष्ण के प्रथम मिलन की कथा

 

       

भांडीरवन की दोपहर थी! सूर्य आकाश के मध्य मानो ठहर-सा गया था।...

 यमुना की ओर से आती मंद पवन वृक्षों के पत्तों को धीरे-धीरे हिला रही थी। गायें हरी घास चर रही थीं और ग्वालबाल भोजन करके इधर-उधर विश्राम कर रहे थे।

कदम्ब के विशाल वृक्ष के नीचे बालकृष्ण लेटे थे। सिर के नीचे अपनी भुजा रखे, अधरों पर हल्की मुस्कान लिए उन्होंने आंखें मूँद लीं। उनके मन में बीते हुए कल की एक मधुर लहर उठने लगी।..

कल प्रातः उन्होंने पहली बार उस गौरवर्णी किशोरी को देखा था। यमुना तट पर खड़ी वह अपने सखियों के साथ पुष्प चुन रही थी। क्षणभर के लिए दोनों की दृष्टियाँ मिली थीं। न कोई परिचय हुआ, न कोई संवाद, किन्तु वह एक क्षण जैसे अनन्त बन गया।

आज उसी स्मृति ने कृष्ण के हृदय में अपना घर बना लिया था।

उन्होंने मन ही मन सोचा,

"वह कौन थी? उसकी आँखों में ऐसा अपनापन क्यों था, मानो युगों से जानता हूँ?"

स्मरण करते-करते उनके मुख पर मुस्कान और गहरी हो गई।

तभी मन में एक बाल-सुलभ विचार कौंधा।

"यदि वह सचमुच मुझे याद करती होगी, तो अवश्य यहाँ आएगी। और जब तक वह स्वयं आकर मुझे नहीं जगाएगी, मैं नहीं उठूँगा!"

यह सोचकर उन्होंने अपनी आँखें और कसकर बंद कर लीं।..🌺🌺


उधर कल जब से भांडीरवन में राधा ने श्रीकृष्ण को देखा, उनकी विचित्र स्थिति थी। सखियाँ बातें कर रही थीं, किन्तु उनका मन कहीं और था। बार-बार उन्हें वही श्यामल बालक याद आ रहा था जिसकी मुरली की ध्वनि कल उन्होंने दूर से सुनी थी।

अचानक एक सखी बोली,

"राधे! चलो, भांडीरवन से पुष्प ले आते हैं।"

राधा का हृदय जैसे किसी ने छू लिया। उन्होंने सहज बनने का प्रयत्न किया, पर उनके चरण स्वयं ही उस दिशा में चल पड़े।

कुछ समय बाद वे सखियों सहित भांडीरवन पहुँचीं।

वहाँ वृक्षों की छाया में उन्हें एक अद्भुत दृश्य दिखाई दिया।

श्यामसुन्दर कदम्ब के नीचे लेटे थे। मोरपंख मंद पवन में हिल रहा था। मुख पर ऐसी मुस्कान थी जैसे कोई मधुर स्वप्न देख रहे हों।

राधा कुछ क्षण उन्हें निहारती रहीं।

फिर धीरे से निकट आकर बोलीं,

"कान्हा! सो रहे हो या सोने का अभिनय कर रहे हो?"

कृष्ण ने कोई उत्तर नहीं दिया।

राधा मुस्कराईं।

उन्होंने पास पड़ी एक कदम्ब-मंजरी उठाई और बहुत धीरे से कृष्ण के कपोल को स्पर्श किया।

क्षणभर बाद कृष्ण ने आँखें खोलीं।

दोनों की दृष्टियाँ मिलीं।

ऐसा लगा मानो वन का समस्त संगीत थम गया हो। यमुना की लहरें भी सुनने लगी हों कि यह मौन संवाद क्या कह रहा है।

कृष्ण उठकर बैठ गए और हँसते हुए बोले,

"मैं जानता था कि तुम आओगी।"

राधा ने आश्चर्य से पूछा,

"कैसे?"

कृष्ण ने उत्तर दिया,

"क्योंकि जब कोई हृदय में बस जाता है, तब उसे बुलाने के लिए शब्दों की आवश्यकता नहीं होती।"

सखियाँ खिलखिलाकर हँस पड़ीं।

कदम्ब के फूल झरने लगे। दूर कहीं एक कोयल गाने लगी।

और भांडीरवन की वह दोपहर ब्रज की मधुर स्मृतियों में सदा के लिए बस गई, जहाँ एक ओर बालकृष्ण की चंचलता थी, तो दूसरी ओर राधा के प्रथम प्रेम की कोमल आहट। 

                                            ~ कृष्णानंद🙏🙏

              🌺🌺🌹❤️🌿✨🦚❤️🌹🌺🌺

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