Skip to main content

अय भाग जा दरिन्दे फ़ौरन (ग़ज़ल):


तमाम संघर्षों को समर्पित...
                                 
                                        ग़ज़ल



                                                - कवि महेन्द्र मिहोनवी

अय भाग जा दरिन्दे फ़ौरन मचान लेकर
निकले हैं  अब परिन्दे गद्दी पे प्रान लेकर

दरकी  हैं ये  ज़मीनें  कय्यक हज़ार मीलों
फूटी  हैं  कुछ चटानें इतनी  उठान लेकर

रस्ते  में  हर क़दम पर  खूँख़ार जानवर हैं
चलना  हमें  पड़ेगा  तीरो   कमान लेकर

बुलबुल को बर्तनी है अतिरिक्त सावधानी
सैयाद   घूमते  हैं  टोही   विमान  लेकर

जिसमें मगर के हक़ में सारे नियम बने हैं
चाटेंगीं मछलियाँ क्या एसा विधान लेकर

जंगल  में दूर   शायद  बरसात  हो रही है
आने  लगीं हवायें  माफ़िक़ रुझान लेकर

लाठी नहीं तो क्या ग़म बाजू तो हैं सलामत
मिट्टी  को  रो  रहे हो  हीरों की खान लेकर

जगमग  है  राजधानी  मेला  नया  लगा  है
ठग  तो  वही  पुराने   बैठे  दुकान  लेकर

इससे तो था ये अच्छा आते न मुझसे मिलने
सीने  से लग  रहे हो  दिल में गठान लेकर

माने  कोई न   माने  मंज़िल के जो दीवाने
वो   बैठते  नहीं  हैं  पथ में थकान लेकर 
                     ★★★

Comments

Popular posts from this blog

मुर्गों ने जब बाँग देना छोड़ दिया..

                मत बनिए मुर्गा-मुर्गी! एक आदमी एक मुर्गा खरीद कर लाया।.. एक दिन वह मुर्गे को मारना चाहता था, इसलिए उस ने मुर्गे को मारने का बहाना सोचा और मुर्गे से कहा, "तुम कल से बाँग नहीं दोगे, नहीं तो मै तुम्हें मार डालूँगा।"  मुर्गे ने कहा, "ठीक है, सर, जो भी आप चाहते हैं, वैसा ही होगा !" सुबह , जैसे ही मुर्गे के बाँग का समय हुआ, मालिक ने देखा कि मुर्गा बाँग नहीं दे रहा है, लेकिन हमेशा की तरह, अपने पंख फड़फड़ा रहा है।  मालिक ने अगला आदेश जारी किया कि कल से तुम अपने पंख भी नहीं फड़फड़ाओगे, नहीं तो मैं वध कर दूँगा।  अगली सुबह, बाँग के समय, मुर्गे ने आज्ञा का पालन करते हुए अपने पंख नहीं फड़फड़ाए, लेकिन आदत से, मजबूर था, अपनी गर्दन को लंबा किया और उसे उठाया।  मालिक ने परेशान होकर अगला आदेश जारी कर दिया कि कल से गर्दन भी नहीं हिलनी चाहिए। अगले दिन मुर्गा चुपचाप मुर्गी बनकर सहमा रहा और कुछ नहीं किया।  मालिक ने सोचा ये तो बात नहीं बनी, इस बार मालिक ने भी कुछ ऐसा सोचा जो वास्तव में मुर्गे के लिए नामुमकिन था। मालिक ने कहा कि कल...

ब्रह्मराक्षस कौन है?..(1)

गजानन माधव 'मुक्तिबोध'~  कविता:                 'ब्रह्मराक्षस' गजानन माधव 'मुक्तिबोध'   हिंदी के ऐसे कवि हैं जिनकी कविताओं का मर्म भेदने के लिए कविता के शब्दों से अधिक मुक्तिबोध के मानस में उतरना पड़ता है। उनकी कविताओं के शब्द एक पर्दे की तरह हैं जिनको खोले बिना आप उनके पीछे का संसार नहीं देख सकते, उसके सौंदर्य को नहीं परख सकते। केवल शब्दों से उनके काव्य-सौंदर्य की थाह लगा लेना उसी तरह मुश्किल है जैसे किसी कमरे के पर्दे के बाहर से कमरे के भीतर की स्थितियों को जानने की कोशिश करना। उनके शब्द अनुमान का साधन मात्र हैं, प्रत्यक्ष का अनुभव कराने के साधन नहीं- उद्भ्रांत शब्दों के नए आवर्त में हर शब्द निज प्रति शब्द को भी काटता, वह रूप अपने बिंब से भी जूझ विकृताकार-कृति है बन रहा...                             - 'ब्रह्मराक्षस' मुक्तिबोध की कविताओं में ऐसे ही शब्दों के अनेक आवर्त-चक्र मिलते हैं जो उनकी कविताओं के नए पाठकों  को चकरा देते हैं। कविताओं के शब्द अपने ही नए ...

नाथ-सम्प्रदाय और गुरु गोरखनाथ का साहित्य

स्नातक हिंदी प्रथम वर्ष प्रथम  परीक्षा की तैयारी नाथ सम्प्रदाय   गोरखनाथ     हिंदी साहित्य में नाथ सम्प्रदाय और                 गोरखनाथ  का योगदान                                                   'ग्यान सरीखा गुरु न मिल्या...' (ज्ञान के समान कोई और गुरु नहीं मिलता...)                                  -- गोरखनाथ नाथ साहित्य को प्रायः आदिकालीन  हिन्दी साहित्य  की पूर्व-पीठिका के रूप में प्रस्तुत किया जाता है।  रामचंद्र शुक्ल ने हिंदी साहित्य के प्रारंभिक काल को 'आदिकाल' की अपेक्षा 'वीरगाथा काल' कहना कदाचित इसीलिए उचित समझा क्योंकि वे सिद्धों-नाथों की रचनाओं को 'साम्प्रदायिक' रचनाएं समझते थे। अपने 'हिंदी साहित्य का इतिहास' ...