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कहानी माँ कालिका और च्यवन ऋषि की

        कालिकन धाम की माँ कालिका 

               और च्यवन ऋषि 


प्राचीन अवध प्रांत अपने महान राजाओं और भगवान श्रीराम के कारण से विशेष प्रसिद्ध रहा है। उसकी प्रसिद्धि का एक अन्य कारण गांव-गांव, छोटे-मोटे नगरों में विविध मंदिरों का होना भी है। ये मंदिर प्रायः स्थानीय या ग्राम-देवियों/देवताओं के केंद्र हैं। ग्रामीण जनता के लिए ये धार्मिक आस्था/प्रार्थना-केंद्र, शांतिस्थल, मेलाकेन्द्र आदि के रूप में रहे हैं।


इन्हीं मंदिरों में एक विशिष्ट मन्दिर आधुनिक अमेठी जनपद/नगर से 12 किलोमीटर दूर संग्रामपुर में स्थित एक प्राचीन मंदिर है। इसे कालिकन धाम मन्दिर के नाम से जाना जाता है। लोगों की मान्यता है कि यहाँ की कालिका माँ के दर्शन मात्र से ही भक्तों की हर इच्छा पूरी हो जाती है। नवरात्रि आने पर तो माँ के मंदिर को विशेष रूप से सजाकर तैयार किया जाता है। मां कालिकन मंदिर अपने चमत्कार के लिए जाना जाता है।

यह धाम अमेठी के संग्रामपुर ब्लॉक के भौंसिंह पुर गाँव में स्थित है। ऐसी मान्यता है कि यहां मौजूद कुंड में स्नान करने से आंखों से जुड़ी बीमारियां दूर हो जाती हैं। इसके साथ ही यह च्यवन मुनि की तपोस्थली भी है। ऐसा कहा जाता है कि उन्होंने कई सालों तक यहां तपस्या की थी।



 मान्यताओं और क्षेत्रीय कथाओं के अनुसार मां कालिकन धाम महर्षि च्यवन मुनि की तपोस्थली रहा है। यहॉं तप करते हुए च्यवन मुनि इतने ज्यादा लीन हो गए थे कि उनके पूरे शरीर पर दीमक लग गये थे। एक दिन उनके दर्शन के लिए जब अयोध्या के राजा अपने परिवार सहित पहुंचे तो उनकी पुत्री सुकन्या ने कौतूहल बस दीमकों को साफ करने का प्रयास किया। सुकन्या के इस प्रयास के दौरान महर्षि की आँखे घायल हो गईं जिसके कारण वे अन्धे हो गए। दीमक की बांदी के छेद में तिनका चुभोने से च्यवन मुनि का ध्यान भी भंग हुआ तो उन्होंने श्राप दे दिया। इससे राजा के सैनिकों में महामारी फैल गयी। राजा को जैसे ही पूरी हकीकत पता चली, उन्होंने आश्रम के सभी मुनियों से मिलकर च्यवन मुनि से माफी मांगी। सभी मुनियों ने निर्णय लिया कि राजा को अपनी राजकुमारी सुकन्या को च्यवन मुनि की सेवा के लिए छोड़कर जाना होगा।

 

राजा की आज्ञा से अपने श्राप के प्रभाव को कम करने और उसका पश्चाताप करने के लिए राजकुमारी को वहीं रहकर महर्षि की सेवा करना पड़ा। राजकुमारी ने पूरी श्रद्धा और लगन से उनकी सेवा की। यह देखकर देवताओं के वैद्य अश्विन कुमारों ने यहां पर एक दिव्य कुंड की स्थापना की, जिसमें स्नान करने के बाद महर्षि की आँखें ठीक हो गई और वह फिर से युवा बन गए। इसी कारण इस मंदिर को लेकर यह मान्यता है कि यहां कुंड में स्नान करने से आखों से संबंधित बीमारियां ठीक होती हैं। यह भी कहा जाता है कि अश्विन कुमारों ने च्यवन ऋषि के लिए जो च्यवनप्राश बनाया उसी से वे वृद्ध से युवा हो गए! ऐसी भी मान्यता है कि राजकुमारी सुकन्या के त्याग-तप के चलते उन्हें कालिका माता के रूप में पूजा जाने लगा और उन्हीं की तपस्थली के रूप में यह स्थल/मन्दिर 'कालिकन धाम' के नाम से प्रसिद्ध हुआ! ■■


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