असली गुनहगार का अंत
कब होगा?
लोगों की जान बचाने के लिए वह रात में 'ऑन कॉल' ड्यूटी पर थी, लेकिन वह खुद को दरिंदो से बचाने में नाकाम रही!
उसके पिता ने उसे नग्न अवस्था में फर्श पर पड़ा हुआ पाया, उसकी Pelvic Bone (कूल्हे की हड्डी) टूटी हुई थी, हाथ-पैर विकृत थे और उसकी आंखों में चश्मे के टुकड़े टूटे हुए थे और लगातार खून बह रहा था। उन अंतिम क्षणों में उसकी दुर्दशा अकल्पनीय है।
उसके माता-पिता को अपराध स्थल पर पहुंचने के 3 घंटे बाद तक उसके शव से संपर्क करने से मना कर दिया गया। उसके शरीर में 100 ग्राम semen पाया गया। एक बलि का बकरा हिरासत में है।
मेडिकल कॉलेज के प्रिंसिपल ने कहा कि वह मानसिक रोगी थी और सुसाइड कर ली है।उन्होंने अपने पद से इस्तीफा दे दिया और अगले दिन उन्हें एक बड़े मेडिकल कॉलेज के प्रिंसिपल के रूप में नियुक्त किया गया।
सीबीआई को ट्रांसफर होने के बाद अस्पताल में रेनोवेशन का काम शुरू हुआ।
इस बिंदु पर अब यह केवल डॉक्टर का मामला नहीं रह गया है, यह सिर्फ अमानवीय है। हम साल-दर-साल अमानवीयता के निचले स्तरों पर गिरते जा रहे है।
मूर्ख वे थे, जिन्हें यह भी उम्मीद थी कि निर्भया मामले के बाद सुधार होंगे।
12 साल हो गये. कुछ नहीं बदला है। ...
महिला उत्पीड़न विरोधी संघर्ष सभी उत्पीड़न विरोधी संघर्षो का अंग है:
कोलकाता के आर जी कर मेडिकल कॉलेज में एक पोस्ट ग्रेजुएट छात्रा (जूनियर डॉक्टर) के साथ बलात्कार और हत्या की घटना देश-विदेश तक चर्चा का विषय बन चुकी है। यह घटना 8-9 अगस्त की दरम्यानी रात की है। सोशल मीडिया में इसपर बहुत सारी बातें आ चुकी हैं। हमारा मकसद उनको दोहराना नहीं है, बल्कि उन पहलुओं को सामने लाना है जिनकी चर्चा नहीं हुई है या कम हुई है।
इसके प्रतिवाद के क्रम में कई महिला संगठनों व जनतांत्रिक सांस्कृतिक संगठनों ने मिलकर 14-15 अगस्त की रात प्रदर्शन की घोषणा की थी जिसके प्रभाव में जमशेदपुर सहित देश के कई शहरों में कार्यक्रम लिए गये थे। रात में कार्यक्रम के माध्यम से यह संदेश देने की कोशिश की गयी थी कि 1947 की इस रात को भले ही देश को आजादी मिल गयी हो, लेकिन महिलाओं सहित देश की बड़ी आबादी आज भी पददलित गुलाम और असुरक्षित है। दूसरे, संघर्ष में शामिल महिलाएं यह संदेश देना चाहती थीं कि वे डरी नहीं हैं और रात की सड़कें जितना पुरुषों की हैं, उतना ही उनकी भी!
इस कार्यक्रम ने इस प्रतिरोध आंदोलन को जूनियर डॉक्टर समुदाय के छोटे दायरे से बाहर निकालकर व्यापक जनांदोलन में बदल दिया है। यह इसकी बड़ी उपलब्धि है।
उसी रात जब कोलकाता सहित देश भर के लोग विरोध जता रहे थे, उस समय गुंडों-लफंगों का बड़ा हुजूम उस मेडिकल कॉलेज कैंपस में तोड़-फोड़ कर आतंक का तांडव मचा रहा था। यह रहस्य बना हुआ है और शायद हमेशा के लिए बना रह जायेगा कि वे कौन थे और उनका उद्देश्य क्या था? प्रदर्शन में शामिल लोगों को डराना या अपराध का साक्ष्य मिटाना या कुछ और? उतना ही बड़ा रहस्य है कि इस संगठित गुंडा गिरोह के पीछे कौन था? कोई राजनीतिक ताकत या सिर्फ अपराधी गिरोह?
इस निंदनीय हमले के बाद आंदोलनरत डॉक्टरों की इच्छा के विपरीत इस आंदोलन ने राजनीतिक रूप धारण कर लिया।.. सत्ता से लेकर विपक्ष तक सभी पार्टियां कोलकाता की सड़कों पर उतर गयीं। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी अपने तंत्र की विफलता का विश्लेषण कर उसे दुरुस्त करने की जगह अभियुक्त के लिए फांसी की सजा की मांग करने के लिए सड़क पर थीं और इस तोड़फोड़ के लिए 'राम वाम' को जिम्मेदार ठहरा रही थीं। इसके विपरीत विपक्ष (वाम से दक्षिण तक) यह आरोप लगा रहा था कि इस पूरे प्रकरण को रफा दफा करने में राज्य सरकार लगी हुई है और उसका तंत्र इस अपराध में शामिल है।
इसके विपरीत देश की आंदोलित जनता दूसरे सवालों से जूझ रही है। निर्भया कांड की लम्बी लड़ाई और उसके दबाव में बने कानून के बावजूद महिलाओं के खिलाफ हमले बढ़ते ही गये हैं तो इस संघर्ष का हश्र क्या होगा? एक अर्थ में यह अपराध निर्भया कांड से भी ज्यादा भयावह है, क्योंकि यह पीड़िता सड़क पर नहीं, अपनी ड्यूटी पर थी और 36 घंटों की ड्यूटी से थकचूरकर विश्राम कर रही थी। नियमतः यहाँ उसे घर से भी ज्यादा सुरक्षित होना चाहिए था और उसकी सुरक्षा में चूक सरकारी तंत्र के लिए शर्म की बात है।
यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि अभियुक्त को फांसी दिलाने की जिम्मेदारी पश्चिम बंगाल सरकार की जाँच एजेंसी की थी जिसकी संदिग्ध भूमिका के कारण कोलकाता हाई कोर्ट ने मामला सीबीआई को सौंप दिया है। लेकिन केंद्र सरकार के इस 'तोते' का रिकॉर्ड भी विवाद से परे नहीं है।
यह सच है कि जनाक्रोश के दबाव में बलात्कार और हत्या के कुछ मामलों में फांसी की सजा तक हुई है। तब इससे भी बड़ा सवाल पैदा होता है कि इसके बावजूद पहले से ज्यादा वीभत्स कांड क्यों होते जा रहे है और इस प्रवृति का अंत कैसे होगा?
इसका जवाब शासक वर्ग की पार्टियों के दोहरे चरित्र में छुपा है। याद कीजिये, हमारे प्रधानमंत्री ने 15 अगस्त 2022 को लालकिला से अपने सम्बोधन में नारी सम्मान की लम्बी चौड़ी बात की थी और उसके अगले ही दिन बिलकिस बानो के अपराधियों को छोड़ा गया था. इस बार के स्वतंत्रता दिवस के सम्बोधन में महिला उत्पीड़न पर चिंता व्यक्त की गयी और आसाराम व रामरहीम परोल पर जेल से बाहर आ गये।
- भाजपाई नेतागण, चाहे वे महिला हों या पुरुष, इस घटना पर तो खूब चिल्ला रहे हैं, लेकिन जम्मू कश्मीर से लेकर उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, बिहार और मणिपुर जैसे भाजपा शासित प्रदेशों में महिला उत्पीड़न पर उनकी जुबान खुलती ही नहीं।
- उसी तरह ममता बनर्जी सड़क पर मार्च तो कर रही हैं, लेकिन इस कांड से जुड़े कई सवालों पर उनकी जुबान बंद है। ऐसे दो सवाल बहुत महत्वपूर्ण हैं. इधर खुलासा हुआ कि यह कॉलेज लूट और भ्रष्टाचार का अड्डा था जहाँ छात्रों से लेकर मरीजों तक का दोहन होता था। क्या उन्हें इसकी जानकारी नहीं थी? इस कांड के बावजूद प्रिंसिपल का सिर्फ तबादला क्यों हुआ, उसे निलंबित क्यों नहीं किया गया। पुलिस ने उससे पूछताछ क्यों नहीं की?
- सबसे खतरनाक तो यह है कि 14-15 अगस्त की रात उस मेडिकल कॉलेज की सुरक्षा की पर्याप्त व्यवस्था क्यों नहीं थी!
सम्भवतः उनके पास इन सवालों के जवाब हैं ही नहीं और इस कांड के बाद उनकी धूमिल छवि उनकी सरकार के अंत की शुरुआत हो सकती है।
जो भी हो, इस चर्चा से दो बातें बिल्कुल साफ हो जाती हैं। पहला यह कि इन पूंजीवादी पार्टियों के राज में इस समस्या का मुकम्मल हल हो ही नहीं सकता, क्योंकि सभी राजनीतिक दल यही साबित करने के फिराक में रहते हैं कि हमारे खेमे के हत्यारे और बलात्कारी "संस्कारी व सदाचारी" हैं और विरोधी खेमे वाले दुराचारी। इसलिए अपराधी हमेशा कोशिश करते हैं कि किसी न किसी सरकार का वरदहस्त उनके सर पर हो। यहाँ मामला इसलिए उलझ जाता है कि राज्य में तृणमूल कांग्रेस की सरकार है और केंद्र में भाजपा गठबंधन की। इसलिए जाँच एजेंसियों के हाथ पांव फूलने लगेंगे और मामला राजनीतिक दांवपेंच में उलझ कर रह जायेगा, इसकी संभावना मौजूद है।
दूसरी बात यह कि समाज में वर्ग, जाति, धर्म, भाषा, लिंग के आधार पर शोषण और उत्पीड़न जारी है और ऐसा नहीं हो सकता कि एक उत्पीड़न जारी रहे और दूसरा मिट जाये। सबका नाश एक साथ होगा और शोषण पर टिकी व्यवस्था के खात्मे के साथ होगा। इस क्रम में ऐसे संगीन मामलों को उलझाने वाली राजनीतिक पार्टियों का अंत भी हो जायेगा। इसलिए इस लड़ाई को बिना थके, बिना रुके अंत तक चलाना होगा और इस बिंदु पर हम आंदोलन के साथ एकजुटता व्यक्त करते हुए इसकी सफलता की कामना करते हैं।
- कवीन्द्र.
★★★★★★★
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