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गोदान का 'मेहता' आज भी जिंदा है!..

 हिन्दी साहित्य         

                         प्रेमचन्द और 

          गोदान का 'मेहता'


प्रेमचन्द का उपन्यास 'गोदान' किसानी जीवन की जीवन्त और सच्ची गाथा के लिए ही नहीं विश्व-प्रसिद्ध है, बल्कि अपने पात्रों की जीवंतता के लिए भी यह इतना विख्यात हुआ है। प्रेमचन्द के इस उपन्यास में पचास से अधिक पात्रों की उपस्थिति अखरती नहीं, बल्कि बहुत जरूरी लगती है। पात्र चाहे ग्रामीण और किसानी जीवन से सम्बंधित हों या शहरी और धनाढ्य वर्ग से, वे सभी वास्तविक और आज भी हमारे आसपास के जीते-जागते चरित्र लगते हैं। इन्हीं चरित्रों में एक चरित्र मेहता का है जो अगर न होता तो जैसे यह उपन्यास अधूरा होता।

 गोदान का मेहता एक ऐसा मध्यवर्गीय चरित्र है जिसमें प्रेमचन्द ने वे सारी विशेषताएँ पिरोई हैं जिन्हें हम आज भी अपने आसपास के इस वर्ग के चरित्रों में देख सकते हैं। मेहता मध्यवर्ग का एक सुविधाभोगी व्यक्ति है किंतु कष्टमय जीवन, गरीबों के जीवन के बारे में एक आदर्शवादी सोच रखता है। उसकी दृष्टि में- "छोटे-बड़े का भेद केवल धन से ही नहीं होता। मैंने धन-कुबेरों को भिक्षुओं के सामने घुटने टेकते देखा है।..." प्रेमचन्द यहाँ मेहता के चरित्र में अंतर्विरोध दिखाते हैं क्योंकि ऐसा शायद ही कभी होता हो जब धनाढ्य-वर्ग गरीबों के सामने घुटने टेकता है। लेकिन मध्यवर्ग का व्यक्ति अपने वर्ग के विचारों को सही ठहराने के लिए अपवादों को भी एक सामान्य घटना की तरह प्रस्तुत करता है। मेहता के माध्यम से प्रेमचन्द ने इसी मध्यवर्गीय चरित्र को उभारा है। इस मध्यवर्गीय व्यक्ति के आसपास उसके वर्ग के लोग ही प्रायः देखे जाते हैं किन्तु यह वर्ग हमेशा अपने से उच्च वर्ग के बीच में रहने के लिए उद्यत रहता है। मेहता का जीवन भी राय साहब, पंडित ओंकारनाथ, दलाल वकील श्याम बिहारी तंखा, मिल मालिक खन्ना, मालती, मिर्जा खुर्शेद आदि के बीच ही कटता है।

मेहता चूँकि मध्यवर्गीय बुद्धिजीवी है इसलिए उसमें वे सारी विशेषताएँ हैं जो खाते-पीते पढ़े-लिखे लोगों में पाई जाती हैं। वह दर्शनशास्त्र का प्रोफेसर है। प्रेमचन्द उपन्यास में मेहता को डॉक्टर मेहता भी लिखते हैं।   प्रेमचन्द उसका परिचय  उपन्यास के छठें भाग में कराते हुए लिखते हैं- "मिस्टर बी. मेहता यूनिवर्सिटी में दर्शनशास्त्र के अध्यापक हैं।..." मेहता रायसाहब के सहपाठी रहे हैं, इसलिए होरी जैसे असामियों-किसानों के द्वारा 'शगुन के रुपये भेंट' करने के बाद होने वाले धनुष-यज्ञ और दावत के विशिष्ट मेहमान हैं। मेहता रायसाहब की हाँ में हाँ तो नहीं मिलाते, किन्तु सीधे-सीधे किसी बात का विरोध भी नहीं करते। प्रेमचन्द उसके बारे में लिखते हैं कि वे "विरोध तो करना चाहते थे, पर सिद्धांत की आड़ में।.." मेहता ने एक पुस्तक कई साल के परिश्रम से लिखी थी। पर उसकी जितनी धूम होनी चाहिए थी, उसकी शतांश भी न होने से बहुत दुखी थे। यह असन्तुष्टि बुद्धिजीवी वर्ग की अपनी विशेषता है। 
मध्यवर्गीय चरित्रों में मेहता का चरित्र प्रेमचन्द ने इस तरह उभारा है कि वह रायसाहब जैसों को भी बेनकाब कर सकता है। वह एक स्पष्टवादी व्यक्ति है और किसी के भी सामने उसका सच उघाड़ सकता है। इसीलिए कभी-कभी लगता है कि जैसे वह प्रेमचन्द का प्रतिनिधि पात्र है। बुद्धिजीवी वर्ग के इस पात्र में यह हिम्मत है कि वह उच्च वर्ग के लोगों के बीच कह सके- "मुझे उन लोगों से जरा भी हमदर्दी नहीं है, जो बातें तो करते हैं कम्युनिस्टों की-सी, मगर जीवन है रईसों का-सा, उतना ही विलासमय, उतना ही स्वार्थ से भरा हुआ।"

मेहता बुद्धिजीवी होने के चलते विचार और तर्क पर विश्वास करते हैं। यह विचारवादिता उन्हें एक नास्तिक व्यक्ति बना देती है। प्रेमचन्द मेहता की इस नास्तिकता को व्यक्त करते हुए लिखते हैं- "किसी सर्वज्ञ ईश्वर में उनका विश्वास न था। यद्यपि वह अपनी नास्तिकता को प्रकट न करते थे..." प्रेमचन्द मेहता के व्यक्तित्व में एक इस नास्तिक-तर्कशीलता को इस प्रकार स्पष्ट करते हैं- "यह धारणा उनके मन में दृढ़ हो गई थी कि प्राणियों के जन्म-मरण, सुख-दुख, पाप-पुण्य में कोई ईश्वरीय विधान नहीं है।" यहाँ प्रेमचन्द मेहता की नास्तिकता को इस प्रकार प्रकट करते हैं कि मेहता के रूप में जैसे वे खुद ही अपने विचार व्यक्त कर रहे हों।
मेहता नास्तिक होने के कारण भले ही ईश्वर के अस्तित्व में विश्वास न करते हों किन्तु वे मानवतावादी हैं। प्रेमचंद लिखते हैं- "ईश्वर की कल्पना का एक ही उद्देश्य उनकी समझ में आता था और वह था मानव-जाति की एकता।..." प्रेमचन्द मेहता के इस मानवतावाद को और स्पष्ट करते हुए कहते हैं- "मानव-समाज की एकता में मेहता का दृढ़ विश्वास था, मगर इस विश्वास के लिए उन्हें ईश्वर-तत्व को मानने की जरूरत न मालूम होती थी।..."
मेहता की यह मानवतावादी दृष्टि उन्हें धर्म और जाति की संकीर्णता से ऊपर उठा हुआ व्यक्ति बना देती है।
       मेहता मानवतावादी तो हैं ही किन्तु उनका यह मानवतावाद केवल सिद्धान्त तक न होकर व्यावहारिक है। वे गरीबों और उपेक्षितों की सहायता के लिए हमेशा तत्पर रहते हैं। प्रेमचन्द उनके बारे में लिखते हैं, "सब मिलाकर एक हजार रुपये से अधिक महीने में कमा लेते थे, मगर बचत एक धेले की भी न होती थी। रोटी-दाल खाने के सिवा और उनके हाथ कुछ न था।...कुछ रुपये किताबों में उड़ जाते थे, कुछ चंदों में, कुछ गरीब छात्रों की परवरिश में..." इसी कारण उनकी स्थिति यहाँ तक पहुँच गई कि मकान के किराये भी न देने के चलते उनके खिलाफ कुर्की की डिग्री हो गई। किसी तरह मालती ने कुर्की से उन्हें बचाया।

मेहता के मन में विवाह की इच्छा तो नहीं है किंतु प्रेम की उत्कट लालसा है। यद्यपि उनके हृदय का प्रेम मुख्यतः मानवता के प्रति प्रेम के रूप में गोदान में चित्रित हुआ है किंतु मालती के प्रति उनका प्रेम सम्बन्ध इसे एक सामाजिक प्रेम में बांध देता है। मेहता के हृदय में मालती के प्रति प्रेम है किन्तु इस प्रेम के मार्ग में बन्धन उन्हें स्वीकार नहीं हैं। सामान्य जीवन में सामाजिक रूप से यह स्वीकार्य नहीं किन्तु मेहता जैसों को इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता।

मेहता स्त्रियों के प्रति अपने इसी दृष्टिकोण के चलते अविवाहित थे। मेहता की मान्यता है कि "नारी हृदय धरती के समान है, जिससे मिठास भी मिल सकती है, कड़वापन भी।" प्रेमचंद उनके परिचय के प्रारम्भिक अंश में लिखते हैं- "बिन-व्याहे थे, और नवयुग की रमणियों से पनाह माँगते थे।" मेहता कहते हैं, "विवाह को मैं सामाजिक समझौता समझता हूँ और उसे तोड़ने का अधिकार न पुरुष को है, न स्त्री को। समझौता करने के पहले आप स्वाधीन हैं, समझौता हो जाने के बाद आपके हाथ कट जाते हैं।" कदाचित इसीलिए वे यह भी मानते हैं- "अपनी आत्मा का सम्पूर्ण विकास सभी चाहते हैं, फिर विवाह कौन करे और क्यों करे?" दोनों जीवन में श्रेष्ठ जीवन कौन है के सवाल पर उनका उत्तर है कि सामाजिक दृष्टि से विवाहित जीवन श्रेष्ठ है लेकिन 'व्यक्ति की दृष्टि से अविवाहित जीवन'।

       प्रेमचन्द की दूरदृष्टि ने मेहता-मालती जैसे आज के सम्बन्धों को बहुत पहले देख लिया था। आज सह-जीवन सम्बन्धों (Live-in Relations) को कानूनी मान्यता भी मिल गई है किंतु न तो यह व्यावहारिक रूप से मान्यता प्राप्त कर सका है, न ही सामाजिक रूप से। इसके बावजूद यह अस्वाभाविक नहीं माना जाता। इसी रूप में अनेक 'मेहता' और 'मालती' आज भी जिंदा हैं।●
पढ़ें: आज का होरी

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       मेहता सम्बन्धी कुछ महत्वपूर्ण उद्धरण
- "मेहता केवल बाहर के थे, घर उनके लिए न था।...मेहता के लिए घरबारी दुनिया एक अनजानी दुनिया थी, जिसकी रीति-नीति से वह परिचित न थे।"...

- "आय तो एक हजार से ज़्यादा है, मगर वह सारी की सारी गुप्तदान में उड़ जाती है। बीस-पच्चीस लड़के उन्हीं से वजीफा पाकर विद्यालय में पढ़ रहे थे।..."

- "वणिक्-बुद्धि को वह आवश्यक बुराई ही समझते थे।...आत्म-सेवा से बड़ा उनकी नजर में दूसरा अपराध न था।..."
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