'विकास' की कहानी हमारे आसपास कितना कुछ ऐसा घटित हो रहा जो नाक़ाबिले-बर्दाश्त है!...लेकिन इससे भी ज़्यादा बुरा है, किसी पीड़ित की बात न सुना जाना। कभी-कभी लगता है कि यह दुनिया बड़ी तेजी से पीछे लौट रही है। कितना पीछे, कहा नहीं जा सकता। एक भौतिकी के पीएचडी वगैरह डिग्री धारक प्रोफेसर साहब कह रहे थे कि वो डार्विन के विकास के सिद्धांत को नहीं मानते। नहीं मानते कि दुनिया क्रमशः विकसित हो रही है और पीछे नहीं लौटेगी!...वे मानते हैं कि 5000 साल पहले की दुनिया ज़्यादा विकसित थी। आप क्या कर लेंगे?...आप क्या कर सकते है जब यह मानने वाले करोड़ों में हों पृथ्वी शेषनाग के फन पर टिकी है? और भी मुश्किल तब है जब प्रोफेसर साहब सहित तमाम सारे लोग पृथ्वी और शेषनाग कथा पर विश्वास के साथ-साथ सभ्यता के विकास का आनंद उन लोगों से हजारों गुना ज़्यादा लेते हों जो यह मानते हैं कि मिथक-कथाएँ और कुछ भी हों, सभ्यता के विकास की कहान...
CONSCIOUSNESS!..NOT JUST DEGREE OR CERTIFICATE! शिक्षा का असली मतलब है -सीखना! सबसे सीखना!!.. शिक्षा भी सामाजिक-चेतना का एक हिस्सा है. बिना सामाजिक-चेतना के विकास के शैक्षिक-चेतना का विकास संभव नहीं!...इसलिए समाज में एक सही शैक्षिक-चेतना का विकास हो। सबको शिक्षा मिले, रोटी-रोज़गार मिले, इसके लिए जरूरी है कि ज्ञान और तर्क आधारित सामाजिक-चेतना का विकास हो. समाज के सभी वर्ग- छात्र-नौजवान, मजदूर-किसान इससे लाभान्वित हों, शैक्षिक-चेतना ब्लॉग इसका प्रयास करेगा.